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अमृत महोत्सव: हिसार से था सुभाष चंद्र बोस का खास लगाव, 15 तोरणद्वार बना किसानों ने किया था स्वागत

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हिसार (हरियाणा) Published by: ajay kumar Updated Sat, 13 Aug 2022 01:50 AM IST
सार

नेता जी सुभाष चंद्र बोस के स्वागत में किसानों ने कुल 15 जगहों पर तोरणद्वार बनाए थे। करीब तीन घंटे तक लोग स्वागत में लगे रहे। कटला रामलीला मैदान में हुई सभा में वरिष्ठ साहित्यकार विष्णु प्रभाकर समेत कई प्रमुख लोग मौजूद थे। ऐसा ऐतिहासिक स्वागत देखकर ब्रिटिश अफसर भी हैरान थे।  बोस के इस स्वागत को उस वक्त अंग्रेजी अखबारों ने भी प्रमुखता से छापा था।

सुभाष चंद्र बोस
सुभाष चंद्र बोस - फोटो : फाइल
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विस्तार

गांधीजी के सत्याग्रह से आजादी की लड़ाई जोर पकड़ चुकी थी। कांग्रेस के प्रमुख नेताओं की बात आम लोगों पर सीधे असर डाल रही थी। इसी दौरान वर्ष 1938 में हिसार क्षेत्र में बारिश नहीं होने के चलते फसलें सूख गईं। किसानों की इस परेशानी को जब कांग्रेस के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष सुभाष चंद्र बोस ने सुना तो वे वास्तविक हालत जानने पंजाब के दौरे पर निकले। 



दिल्ली लौटते समय हिसार आए तो यहां भव्य स्वागत किया गया। कटला रामलीला मैदान में करीब पांच हजार लोग उनकी सभा में पहुंचे। रात में रुके तो लोगों ने खुशी में अपने-अपने घरों में घी के दीये जलाए। अकाल प्रभावित गांव धांसू व जुगलान पहुंचकर किसानों से बात की। प्रस्तुत है आजादी की लड़ाई में हिसार की भूमिका शृंखला की पांचवीं कड़ी...


गोपीचंद भार्गव ने की थी अगुवाई
सुभाष चंद्र बोस पंजाब से लौटते समय 28 नवंबर 1938 की दोपहर में ट्रेन से हिसार रेलवे स्टेशन पहुंचे। यहां गोपीचंद भार्गव समेत अन्य कांग्रेसी नेताओं ने स्वागत किया। सुभाष चंद्र बोस वहां से गोपीचंद भार्गव के घर गए और कुछ देर विश्राम के बाद कटला रामलीला मैदान के लिए निकले। कांग्रेस नेता के स्वागत में लोगों ने सड़क के दोनों तरफ झंडे लगाए थे।

कुल 15 जगहों पर तोरणद्वार बनाए गए थे। करीब तीन घंटे तक लोग स्वागत में लगे रहे। कटला रामलीला मैदान में हुई इस सभा में वरिष्ठ साहित्यकार विष्णु प्रभाकर समेत कई प्रमुख लोग मौजूद थे। ऐसा ऐतिहासिक स्वागत देखकर ब्रिटिश अफसर भी हैरान थे। सुभाष चंद्र बोस के इस स्वागत को उस वक्त के अंग्रेजी अखबारों ने भी प्रमुखता दी।
   
सभा के बाद सुभाष चंद्र बोस धांसू व जुगलान गांव पहुंचे तो किसानों ने बताया कि सूखा के चलते तमाम घरों में फांकाकशी की नौबत है। ब्रिटिश सरकार की तरफ से मदद के बजाय किसानों से जबरन लगान वसूला जा रहा है। लोगों को यातनाएं दी जा रही हैं। द्रवित सुभाष चंद्र बोस ने हिसार में ही रात्रि विश्राम भी किया। पूरी रात बैठक व चर्चा होती रही। 
 
रोजगारपरक पढ़ाई का दिया था संदेश
रात्रि विश्राम के बाद अगली सुबह सुभाष चंद्र बोस सातरोड गांव के विद्यालय में पहुंचे। इस विद्यालय का संचालन विद्या प्रचारिणी सभा कर रही थी। यहां पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों को शिल्पकारी भी सिखाई जाती थी। बच्चों को रोजगारपरक शिक्षा लेते देखकर सुभाष चंद्र बोस काफी खुश हुए और संस्था के कार्यों की तारीफ करते हुए कहा था कि जब तक पढ़ाई के साथ-साथ रोजगार का भी प्रशिक्षण नहीं दिया जाएगा, तब तक शिक्षा का सही अर्थ नहीं निकलेगा। उन्होंने लोगों को रोजगारपरक शिक्षा के लिए प्रेरित किया था।

आजाद हिंद फौज में भी रही भूमिका
हिसार से लौटने के कुछ दिन बाद ही सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज का गठन शुरू किया था। चार जुलाई 1943 को जब आजाद हिंद फौज पूरी तरह से सक्रिय रूप में सामने आई तो उस वक्त हरियाणा से 398 अधिकारी व 2317 सिपाही भर्ती हो चुके थे। भोजराज गांव निवासी श्योराम, चिड़ौद निवासी शीशराम व सूरजभान, खेदड़ निवासी कैप्टन फतेह सिंह, मंढ़ोली कलां निवासी सूबेदार झंडू राम, श्रीराम, सुल्तानपुर निवासी छोटूराम, कुम्भा निवासी फूल सिंह, कंवारी निवासी रामेश्वरी, समैन निवासी रतिराम, घुड़साल निवासी गंगाजल और हसनगढ़ निवासी भालेराम समेत 539 लोग हिसार जिले के थे। इनमें से 61 अफसर व 478 सिपाही हिसार जिले के रहने वाले थे। नेताजी के बेहद करीबी भालेराम को रंगून में व्यक्तिगत सुरक्षा दस्ता में शामिल किया गया था। 
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