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सुभाष चंद्र बोस जयंती 2022: आजाद हिंद फौज की स्थापना और नेताजी का आजादी के लिए संघर्ष

Bhawna Masiwal भावना मासीवाल
Updated Sun, 23 Jan 2022 12:29 PM IST

सार

आज स्वतंत्रता सेनानी और क्रांतिकारी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती है। सुभाषचंद्र बोस के जन्मदिन को भारत सरकार द्वारा पराक्रम दिवस के रूप में भी मनाया जा रहा है। सुभाष चंद्र बोस का जन्म उड़ीसा के कटक में एक संपन्न बंगाली परिवार में हुआ था।

सुभाष चंद्र बोस में बचपन से ही देश के प्रति प्रेम था। यह प्रेम स्वतंत्रता आंदोलन के समय देखा गया। जब सुभाष चंद्र बोस भारतीय प्रशासनिक सेवा को बीच में ही छोड़कर भारत आ गए। उन्होंने आंदोलन को मजबूती देने के लिए देश के बाहर जाकर आज़ादी के आंदोलन को मजबूती दी।
आज नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती है और पराक्रम दिवस है।
आज नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती है और पराक्रम दिवस है। - फोटो : Twitter/Clio's Chronicles
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विस्तार

आज स्वतंत्रता सेनानी और क्रांतिकारी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती है। सुभाषचंद्र बोस के जन्मदिन को भारत सरकार द्वारा पराक्रम दिवस के रूप में भी मनाया जा रहा है। सुभाष चंद्र बोस का जन्म उड़ीसा के कटक में एक संपन्न बंगाली परिवार में हुआ था। सुभाष चंद्र बोस में बचपन से ही देश के प्रति प्रेम था। यह प्रेम स्वतंत्रता आंदोलन के समय देखा गया। जब सुभाष चंद्र बोस भारतीय प्रशासनिक सेवा को बीच में ही छोड़कर भारत आ गए।

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उन्होंने आंदोलन को मजबूती देने के लिए देश के बाहर जाकर आज़ादी के आंदोलन को मजबूती दी। उन्होंने आजाद हिंद फौज, आजाद हिंद सरकार और बैंक की स्थापना की और देश के बाहर हिंदुस्तान की आज़ादी के लिए अन्य देशों से समर्थन हासिल किया। वह युवाओं की प्रेरणा थे और 41 वर्ष की आयु में 1938 में अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित्त हुए थे।


युवाओं के प्ररेणास्त्रोत

नेताजी ने भारतीय युवाओं में देशभक्ति की लौ जगाईं और उनके भीतर राष्ट्र प्रेम और उसके लिए बलिदान का भाव जगाया और नारा दिया- 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।' यह नारा अपने समय में युवाओं के लिए इंकलाब नारा था। इसी ने विदेशी जमीन में देश की आजादी की लड़ाई के लिए एक सेना तैयार की। ‘स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी साहित्य का इतिहास’ पुस्तक में मदनलाल वर्मा ‘क्रान्त’ सुभाष चंद्र बोस के शब्दों में लिखते हैं कि ‘मैं जानता हूँ कि ब्रिटिश सरकार भारत की स्वाधीनता की मांग कभी स्वीकार नहीं करेगी।
 

मैं इस बात का कायल हो चुका हूं कि यदि हमें आजादी चाहिए तो हमें खून के दरिया से गुजरने को तैयार रहना चाहिए। अगर मुझे उम्मीद होती कि आजादी पाने का एक और सुनहरा मौका अपनी जिन्दगी में हमें मिलेगा तो मैं शायद घर छोड़ता ही नहीं। मैंने जो कुछ किया है अपने देश के लिये किया है। विश्व में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने और भारत की स्वाधीनता के लक्ष्य के निकट पहुंचने के लिए किया है। भारत की स्वाधीनता की आखिरी लड़ाई शुरू हो चुकी है।


आज़ाद हिन्द फौज के सैनिक भारत की भूमि पर सफलतापूर्वक लड़ रहे हैं। हे राष्ट्रपिता! भारत की स्वाधीनता के इस पावन युद्ध में हम आपका आशीर्वाद और शुभकामनाएं चाहते हैं। सुभाषचन्द्र बोस द्वारा ही गांधी जी के लिए प्रथम बार राष्ट्रपिता शब्द का प्रयोग किया गया था’।


सुभाषचंद्र बोस ने भारत से बाहर जाकर युद्ध में अंग्रेजों के विरुद्ध शक्तियों से सहायता न केवल सहायता ली, एक सेना भी संगठित की। जिसका उद्देश्य भारत में विदेशीं शक्तियों से युद्ध करना और भारत की आज़ादी हासिल करना था।

नेताजी ने भारतीय युवाओं में देशभक्ति की लौ जगाईं और उनके भीतर राष्ट्र प्रेम और उसके लिए बलिदान का भाव जगाया और नारा दिया- 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।'
नेताजी ने भारतीय युवाओं में देशभक्ति की लौ जगाईं और उनके भीतर राष्ट्र प्रेम और उसके लिए बलिदान का भाव जगाया और नारा दिया- 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।' - फोटो : Netaji Research Bureau

आजादी का आंदोलन और सुभाष बाबू 

भारत में स्वाधीनता आंदोलन के दौरान एक आंदोलन देश के भीतर हो रहा था और दूसरा देश के बाहर सिंगापुर में। देश के भीतर आंदोलन का नेतृत्व महात्मा गांधी कर रहे थे और देश के बाहर आंदोलन का नेतृत्व सुभाष चंद्र बोस कर रहे थे। उन्होंने बर्लिन में स्वतंत्र भारत केंद्र की स्थापना की जिसके बीस सदस्य भारतीय थे। स्वतंत्र भारतीय केंद्र आजाद भारत की अस्थाई सरकार का अग्रगामी रूप था।

सुभाष चंद्र बोस ने न केवल यूरोप में स्वतंत्र भारत केंद्र, भारतीय सैन्य दल, यूरोप में राष्ट्रीय विचारों के भारतीयों का संगठन, गुप्त भारतीय रेडियों केंद्र को संगठित किया एवं अंत में एशिया के लिए पनडुब्बी की रहस्मय यात्रा की। जिस दिन से भारतीय सैन्य दल (आजाद हिंद फ़ौज) का निर्माण आरंभ हुआ, उसी दिन से सैन्य दल के सदस्य उन्हें नेताजी कहकर संबोधित करने लगे।
 
आजाद हिंद रेडियो से समाचार प्रसारण का कार्य 1941 में सात भारतीय भाषाओं(अंग्रेजी, हिंदुस्तानी, बंगला, फारसी, तमिल, तेलुगु और पश्तों) में आरंभ होता है। जर्मनी में स्वतंत्र भारत केंद्र एवं भारतीय सैन्य दल का निर्माण करना नेताजी का प्राथमिक लक्ष्य था।

इस सैन्य दल के बीच ‘जयहिंद’ अधिकृत अभिवादन माना गया था और रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा रचित ‘जन गन मन’ राष्ट्रीय गान था। 21 अक्तूबर 1943 को आजादी के इतिहास में एक स्वर्णिम दिन भी माना जाता है क्योंकि इस दिन सिंगापुर में नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार की घोषणा की थी।

‘अस्थायी सरकार का कार्य होगा कि वह भारत से अंग्रेजों और उनके मित्रों को निष्कासित करे। अस्थायी सरकार का यह भी कर्तव्य होगा कि भारतीयों की इच्छा अनुकूल और उनके विश्वास की आजाद हिंद की स्थायी सरकार का निर्माण करे।’ आजाद हिंद की अस्थायी सरकार की घोषणा के बाद ही सिंगापुर में झांसी की रानी रेजिमेंट के लिए एक शिविर खोला गया।

इसमें किसी भी वर्ग की महिलाएं लड़ाकू सैनिकों, नर्स, अथवा रेजिमेंट में अन्य किसी सहयोगी कार्य के स्वयं- सेविका का प्रशिक्षण ले सकती थी। वह आजादी का दौर ही ऐसा था कि समृद्ध, कान्वेन्ट से शिक्षित युवतियों अपना परिवार छोड़कर इस सैन्य दल का हिस्सा बनती हैं।

आजाद हिंद फौज में झांसी की रानी रेजिमेंट पुरुषों की रेजिमेंट की सहयोगी टुकड़ी थी। इस दल की संचालिका एक सेनानी लक्ष्मी सहगल थी। लक्ष्मी सहगल आजाद हिन्द फौज में स्त्रियों की भागीदारी व स्त्रियों संबंधित मामलों की मंत्री थी यह पेशे से डॉक्टर थी। ‘आजाद हिंद फौज की कहानी’ पुस्तक में ‘अय्यर एस.ए.’ में आजाद हिन्द फौज में स्त्रियों की भागीदारी के संदर्भ में लक्ष्मी सहगल बताती हैं कि “कि सेना में महिलाओं की भर्ती के लिए उन्हें नेताजी को किस प्रकार तैयार करना पड़ा था।

जर्मनी में स्वतंत्र भारत केंद्र एवं भारतीय सैन्य दल का निर्माण करना नेताजी का प्राथमिक लक्ष्य था।
जर्मनी में स्वतंत्र भारत केंद्र एवं भारतीय सैन्य दल का निर्माण करना नेताजी का प्राथमिक लक्ष्य था। - फोटो : Twitter/Adv.Vivekanand Gupta
वे घर-घर गई और उन्होंने महिलाओं के साथ चर्चाएं करके जब लगभग 2000 महिलाओं को इकट्ठा कर लिया तब नेताजी उनके सम्मुख भाषण देने का निश्चय किया। उनमें से उपयुक्त महिलाओं की भर्ती करके डच राइफलें दी गई। 23 अक्तूबर, 1943 को 300 प्रतिशत महिलाओं को लेकर रानी झांसी रेजिमेंट का गठन किया गया था। मार्च 1944 तक हम एक हज़ार हो गई थी”।


आजाद हिंद फौज और स्वतंत्रता आंदोलन 

इस तरह आजाद हिन्द फ़ौज में महिलाओं के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। यह महिलाओं का स्वतंत्र दल था जो देश की स्वाधीनता के लिए युद्ध के उद्देश्य से तैयार किया गया था। लक्ष्मी सहगल बाद के वर्षों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महिला मोर्चे व अखिल भारतीय लोकतांत्रिक महिला संघ की सदस्य बनती हैं।
 
आजाद हिंद फौज आज भी पुरानी पीढ़ी के लिए एक ऐसा नाम है जिसने गुलाम भारत को आजाद करवाने में अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया था। जिसके कितने ही सैनिक कैदी बना दिए गये तो कितने ही हत्या कर दिए गये। जो बचे भी रहे तो गुमनाम हो गए।

इतिहास के पन्नों में हम जब भी आजादी के आंदोलन का इतिहास पढ़ते व पढ़ाते हैं तो देश के भीतर की पूरी व्यवस्था को अवश्य बताते हैं सारे नाम याद करवाते हैं लेकिन देश के बाहर अपने ही देश के उन सिपाहियों को भूल जाते हैं जिन्होंने विपरीत स्थितियों में देश की स्वतंत्रता के लिए एक मजबूत संगठन बनाया और अपना पूरा जीवन देश सेवा में लगा दिया।

बेशक जिस उद्देश्य के लिए आई.एन.ए बनाई गई थी, वह तत्कालीन स्थितियों व परिस्थितियों के कारण सफल नहीं होती है और उसके सैनिक बंदी बना लिए जाते हैं। बावजूद इसके यह एक ऐसा संगठन था, जिसने द्वितीय विश्वयुद्ध में देश को न केवल बाहरी देशों से सुरक्षित किया था; बल्कि देश के भीतर चल रहे राष्ट्रीय आंदोलन को भी मजबूती दी थी।

यह पहला ऐसा सैन्य दल था जिसमें महिलाएं भी सैन्य भूमिका में भारत की आजादी लिए बलिदान के लिए तत्पर थी। महात्मा गांधी के साथ महिलाएं अहिंसावादी नीति के साथ आंदोलन का हिस्सा थी तो वहीं नेताजी के साथ महिलाओं का एक अलग ही सैन्य रूप ‘झांसी रानी रेजिमेंट’ के रूप में मिलता है।

आज नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती है और पराक्रम दिवस है। इस दिवस में उन सभी लोगों को याद करना अनिवार्य हो जाता है जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में अपना सर्वस्व देश के लिए बलिदान कर दिया। बेशक यह वे लोग हैं जिन्हें कभी किसी ने देखा नहीं, कभी इनके नामों को सुना नहीं। लेकिन फिर भी वह अदृश्य सैन्य संगठन और उससे जुड़े सभी लोग हमारी आजादी का प्रतिनिधित्व करने में उतने ही भागीदार है जितने की देश के भीतर आंदोलन करने वाले रहे हैं।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें [email protected] पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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