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तकनीक से बाल तस्करी पर अंकुश : डाटाबेस बने तो अपराधियों और अनुदान पाने वाले फर्जी संस्थानों पर लगेगी लगाम

Mamuni Das मामूनी दास
Updated Sat, 10 Sep 2022 08:36 AM IST
सार

आरपीएफ ने अपराधियों को पकड़ने और पीड़ित बच्चों की मदद के लिए चेहरे की पहचान, बायोमीट्रिक रिकॉर्ड और एक ऑनलाइन डाटाबेस के साथ सुरक्षा कैमरों का उपयोग करने की योजना बनाई है। एक रेल अधिकारी के मुताबिक, पहले ही मार्च, 2022 तक रेलवे 840 स्टेशनों पर सीसीटीवी लगा चुका है।

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार

महामारी के दौरान और उसके बाद अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा बाल तस्करी में तेज वृद्धि की चेतावनी के खिलाफ रेलवे पुलिस बल भी सक्रिय हो गया है, जिसमें बाल तस्करों से निपटने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जाना है। दिसंबर, 2021 में एक नया एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) जारी किया गया, जो रेल पुलिस अधिकारियों से लेकर स्टेशन अधिकारियों तक की विभिन्न जिम्मेदारियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है। 



इस संबंध में नागरिक समाज संगठनों से जुड़े सदस्यों का कहना है कि चीजें काफी स्पष्ट हैं, पर अब भी सुधार की गुंजाइश है क्योंकि इसमें कुछ ऐसे नियम हैं, जो मानवाधिकार उल्लंघन को कम करने के बजाय गोपनीयता के अधिकारों को प्राथमिकता देते हैं। रेलवे स्टेशनों पर भागे हुए, लापता या तस्करी कर लाए गए बच्चों को बाल श्रम के जाल में फंसने से बचाना सरकार और नागरिक समाज की सदैव प्राथमिकता रहा है। 


महामारी ने उन बच्चों की संख्या में वृद्धि की है, जिन्होंने अपने माता-पिता को खो दिया है या जिनके माता-पिता को महामारी ने गरीबी में धकेल दिया है। इसलिए इसके प्रति और अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है। जुलाई, 2021 में रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) ने औपचारिक रूप से प्रत्येक बच्चे तक पहुंचने के लिए अपने प्रयासों को आगे बढ़ाया है। 

विभिन्न हितधारकों द्वारा प्रस्तुत फीडबैक के बाद, आरपीएफ ने दिसंबर, 2021 के अंत में रेलवे के संपर्क में रहने वाले बच्चों की देखभाल के लिए एक ताजा एसओपी जारी किया, जिसमें देश भर में रेलवे पारिस्थितिकी तंत्र की करीबी निगरानी, सभी रेलवे हितधारकों की भूमिकाओं और जिम्मेदारियों पर जोर दिया गया है। साथ ही, इसमें तकनीक के ज्यादा उपयोग की भी बात कही गई है। 

आरपीएफ ने अपराधियों को पकड़ने और पीड़ित बच्चों की मदद के लिए चेहरे की पहचान, बायोमीट्रिक रिकॉर्ड और एक ऑनलाइन डाटाबेस के साथ सुरक्षा कैमरों का उपयोग करने की योजना बनाई है। एक रेल अधिकारी के मुताबिक, पहले ही मार्च, 2022 तक रेलवे 840 स्टेशनों पर सीसीटीवी लगा चुका है। वह बच्चों के अन्य विवरणों के साथ बायोमीट्रिक और उनकी तस्वीरों को रिकॉर्ड करने की भी योजना बना रहा है। 

इसके लिए आरपीएफ रेलवे स्टेशनों पर बचाए गए बच्चों का ऑनलाइन डाटाबेस भी तैयार कर रहा है। रेलवे के एक अधिकारी कहते हैं, '2021 के मध्य तक देश के 7,400 रेलवे स्टेशनों में से केवल 132 में ही नियमित चाइल्ड हेल्पडेस्क था। हमारे पास 1,000 प्रमुख स्टेशन हैं, जिनमें कम से कम 202 स्टेशन सर्वाधिक व्यस्त और भीड़-भाड़ वाले हैं। ऐसे में हमें हेल्पडेस्क नेटवर्क को प्रभावी बनाने के लिए विस्तार की जरूरत है।'
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आधार डाटाबेस भागे या लापता बच्चों के परिवारों का पता लगाने में महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में कार्य करता है। फिर भी नागरिक संगठनों को एक अलग तरह की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। बच्चों को बचाने के लिए काम करने वाली संस्था जीवोदया के एक अधिकारी ने कहा, 'हमारा अनुरोध है कि इस संबंध में एक मानक संचालन प्रक्रिया बनाई जाए, ताकि कोई भी प्राधिकरण या सरकारी एजेंसी ऐसे बच्चों के आधार डाटा तक पहुंच सके, इससे बच्चों का विवरण ढूंढना आसान हो जाएगा और हम बच्चे को कहीं से भी बचा पाएंगे।' 

संस्था के एक अन्य प्रतिनिधि ने कहा, 'एक ऐसी प्रणाली होनी चाहिए, जो बच्चे को चाइल्ड केयर संस्थान में भेजे जाने से पहले या एक नया आधार कार्ड तैयार होने से पहले, निश्चित दिनों के भीतर बच्चे के संपूर्ण विवरण की जांच करने का अधिकार रखती हो। नागरिक समाज के एक सहयोगी ने बताया कि परिवारों के साथ बच्चों को फिर से जोड़ने या नया आधार कार्ड बनाने के लिए कुछ दिनों के भीतर आधार-आधारित खोजों को अनिवार्य करने से ऐसे अविश्वसनीय चाइल्ड केयर संस्थानों पर भी लगाम लग सकती है, जो केवल अनुदान पाने के लिए तस्करों से बच्चों को छुड़ाने का आधा-अधूरा कार्य करते हैं। (चरखा फीचर)

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