कोविड महामारी : डेयरी उद्योग का हाल

Rajesh Pratap Singh राजेश प्रताप सिंह
Updated Thu, 09 Dec 2021 06:52 AM IST

सार

वर्ष 1946 में स्थापित अमूल, जो खेड़ा जिले के समरिखा गांव की समिति से शुरू हुआ, वर्तमान में बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों (एमएनसी) को टक्कर दे रहा है। आज की तारीख में बिहार की दुग्ध सहकारी समिति, जो ‘सुधा’ ब्रांड के नाम से अपना दूध बेच रही है, वह भी व्यवसाय में उत्तर प्रदेश की सरकारी डेयरी पराग से बहुत आगे निकल गई है।
दूध
दूध - फोटो : पिक्साबे
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विस्तार

कोविड महामारी ने तमाम दुखों के साथ-साथ कुछ सामाजिक और व्यावहारिक ज्ञान भी दिया। यह परखने की भी दृष्टि दी कि कैसे उचित प्रशासन के अभाव में सरकारी कार्यों का लाभ आम जनता तक नहीं पहुंचता है। हम उत्तर-प्रदेश की सरकारी डेयरी की बात कर रहे हैं। वर्ष 1917 में प्रयाग में सर्वप्रथम ‘कटरा दुग्ध उत्पादन सहकारी समिति’ की स्थापना हुई और तबसे लेकर अब तक उत्तर प्रदेश इस स्थिति में आ गया है कि वाराणसी मंडल का संचालन राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड को दे दिया गया है। यदि भविष्य में पूरा प्रदेश दे दिया जाए, तो ताज्जुब नहीं होना चाहिए।
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वर्ष 1946 में स्थापित अमूल, जो खेड़ा जिले के समरिखा गांव की समिति से शुरू हुआ, वर्तमान में बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों (एमएनसी) को टक्कर दे रहा है। आज की तारीख में बिहार की दुग्ध सहकारी समिति, जो ‘सुधा’ ब्रांड के नाम से अपना दूध बेच रही है, वह भी व्यवसाय में उत्तर प्रदेश की सरकारी डेयरी पराग से बहुत आगे निकल गई है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में स्थित अपने गांव की डेयरी को देखने पर मुझे हैरानी हुई कि अब तक सरकारी डेयरी खत्म क्यों नहीं हुई। जहां तक सहकारी दुग्ध समिति के पंजीकरण की बात है, तो कार्मिकों के अभाव के कारण यदि आपका व्यक्तिगत संबंध नहीं है, तो पंजीकरण होना मुश्किल है। पंजीकरण के लिए इतनी ज्यादा कागजी खानापूर्ति करनी पड़ती है कि सामान्य किसान बिना विभाग की मदद के कर ही नहीं सकता। पता नहीं क्यों समिति के पंजीकरण में इतनी कागजी कार्रवाई की जाती है?


फिर सबसे महत्वपूर्ण कार्य शुरू होता है दूध खरीदने और उसे प्लांट पर पहुंचाने का। ग्रामीण स्तर पर देखें, तो किसान शुरू में ज्यादा लोभ के चक्कर में दूध में पानी मिला देते हैं, जिससे दूध की गुणवत्ता खत्म हो जाती है। एक बार अगर इस पर अंकुश लगा भी दिया जाए, तो प्लांट के नखरे शुरू हो जाते हैं। पहली बार ‘डस्टबीन पैथोलॉजी’ की तर्ज पर ‘डस्टबीन दुग्ध परीक्षण’ का अनुभव हुआ। दुग्ध संग्रह केंद्र पर दुग्ध में जो वसा और सॉलिड-नॉन-वसा पाया जाता है, उसे प्लांट पर नापने के दौरान कम कर दिया जाता है। सॉलिड-नॉन-वसा दुग्ध के तापमान से भी बदलता है। यह गणित सामान्य किसान को मालूम नहीं होता, जिससे उसे नुकसान उठना पड़ता है। अगर दूध का तापमान कम या ज्यादा करके नापा जाए, तो उसके सॉलिड-नॉन-वसा में परिवर्तन हो जाता है।

इसको प्लांट का आदमी ही जानता है। अगर समिति और प्लांट के मापक यंत्र एक जैसे नहीं हुए, तो किसानों का नुकसान तय है। इस पूरी प्रक्रिया का परिणाम यह होता है कि या तो किसान भ्रष्टाचार में लिप्त होकर बाहर दूध बेचता है या प्लांट के कर्मचारियों को पैसा खिलाता है या दूध का कारोबार बंद कर देता है। हालांकि राजनीतिक दबाव से भी यह ठीक हो सकता है, लेकिन वैसी स्थिति में किसान को संबंधित नेता का पिछलग्गू बनना पड़ेगा। यही कारण है कि प्रदेश, खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसान सरकारी डेयरी से अलग प्राइवेट डेयरी को अपना दूध देने लगे हैं। नतीजतन दुग्ध सहकारी समितियों और दुग्ध उत्पादन में अग्रणी होने के बावजूद उत्तर प्रदेश आज पिछले पायदान पर है।

इस समस्या का समाधान केवल जागरूक और प्रतिबद्ध प्रशासन ही कर सकता है। आज अमूल उत्तर प्रदेश में अपने प्लांट लगा रहा है और हम स्थानीय समितियों को खत्म कर रहे हैं। अभी वाराणसी मंडल राष्ट्रीय दुग्ध विकास बोर्ड को दे दिया गया है, अन्य मंडल भी कमोबेश उसी रास्ते पर जाएंगे। यह कहना गलत है कि इसमें बड़े पद पर भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रखे जाते हैं, इसलिए यह स्थिति है। अमूल और बिहार के सुधा प्लांट में ऊपर के पद पर बाहर से ही अधिकारी रखे जाते हैं। वास्तव में जब तक निचले स्तर पर पद नहीं बढ़ाए जाएंगे, उनकी जिम्मेदारी तय नहीं की जाएगी, तब तक यह समस्या बनी रहेगी। पूरा तंत्र पारदर्शी हो और किसानों की समस्या का त्वरित समाधान हो, तभी प्रदेश की सरकारी डेयरी सफल हो पाएगी। अन्यथा अमूल और सुधा के साथ प्राइवेट दुग्ध-व्यवसायी तैयार हैं।

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