दिल्ली : हिंदू कॉलेज और अध्यापक नंदकिशोर निगम

sudhir vidyarthi सुधीर विद्यार्थी
Updated Fri, 03 Dec 2021 06:29 AM IST

सार

लाहौर में भगत सिंह को जेल से छुड़ाने की कोशिशों के बीच धन जुटाने की उधेड़बुन में आजाद एक दिन दिल्ली आए। उन्होंने छह जून, 1930 को यहां के मशहूर ‘गाडोदिया स्टोर’ पर हाथ मारा, जिसमें उनके साथ काशीराम, धन्वंतरि, विद्याभूषण, विश्वंभर दयाल और भवानी सिंह थे।
हिंदू कॉलेज
हिंदू कॉलेज - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

वर्ष 1899 में स्थापित दिल्ली का हिंदू कॉलेज क्रांतिकारी आंदोलन के दूसरे दौर यानी 1928 के बाद चंद्रशेखर आजाद की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया था। उन दिनों वहां एक अध्यापक थे नंदकिशोर निगम, जो ‘हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ’ के सक्रिय सदस्यों में थे। उनका जन्म दिल्ली में हुआ था।
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वह एम.ए. की परीक्षा की तैयारी कर रहे थे, तभी क्रांतिकारियों के संपर्क में आ गए। हिंदू कॉलेज में अध्यापक नियुक्त होने के बाद उन्होंने वहां हॉस्टल सुपरिंटेंडेंट का कार्यभार भी संभाल लिया। तीन हॉस्टलों में से एक मैटकाफ हाउस रोड पर 4, रामचंद्र लेन में स्थित था, जिसके एक कमरे में निगम रहते थे।


उन्हें 200 रुपये मासिक वेतन मिलता था, जिसमें से दस रुपये अपने पास रख शेष वह दल के लिए कैलाशपति को दे देते थे। कॉलेज साइकिल से आते-जाते थे और भोजन वह एक समय ही किया करते थे। कपड़े वह खादी के पहनते थे, जिन पर बहुत कम खर्च होता था।

22 दिसंबर, 1929 से चंद्रशेखर आजाद भी निगम के पास आकर दिल्ली में रहने लगे थे। तब निगम का आवास क्रांतिकारियों का केंद्र बन गया। वायसराय लॉर्ड इरविन की गाड़ी पर बम विस्फोट करने में जिस मोटर साइकिल का इस्तेमाल किया गया था, उसे हिंदू कॉलेज के हॉस्टल में लाकर ही खोला गया। तब छात्रावास में कोई नहीं था।

भवानी सिंह तथा भवानी सहाय ने उसके पुर्जे अलग कर दोनों टायर यमुना में बहा दिए तथा पुर्जे बोरी में भरकर विमल प्रसाद जैन को दिए, जो मेरठ ले जाकर कबाड़ी के यहां बेचे गए। 23 दिसंबर, 1929 को वायसराय की ट्रेन के नीचे किए गए बम विस्फोट के लिए गांधी ने ‘कल्ट ऑफ द बम’ लिखकर क्रांतिकारियों की आलोचना की, जिस पर भगवती चरण ने ‘फिलासफी ऑफ द बम’ लिखकर अपने दल की कार्यप्रणाली, उद्देश्यों और उसके समझौता विहीन संघर्ष के औचित्य को रेखांकित करते हुए तर्कपूर्ण ढंग से उत्तर दिया, जिसे 26 जनवरी, 1930 को देश भर में वितरित किया गया।

लाहौर में भगत सिंह को जेल से छुड़ाने की कोशिशों के बीच धन जुटाने की उधेड़बुन में आजाद एक दिन दिल्ली आए। उन्होंने छह जून, 1930 को यहां के मशहूर ‘गाडोदिया स्टोर’ पर हाथ मारा, जिसमें उनके साथ काशीराम, धन्वंतरि, विद्याभूषण, विश्वंभर दयाल और भवानी सिंह थे। क्रांतिकारी 13 हजार रुपये छीनकर रात को हिंदू कॉलेज के छात्रावास में कार से पहुंचे।

जब स्टोर मालिक को पता लगा कि यह क्रांतिकारियों का काम है, तो उसने जांच आगे नहीं बढ़ाई। फिर कॉलेज की छुट्टियों में आजाद गढ़वाल में भवानी सिंह के गांव नाथोपुर जाकर अपने साथियों को राइफल और पिस्तौल चलाने की ट्रेनिंग देते रहे। कैलाशपति की मुखबिरी से क्रांतिकारियों का दिल्ली केंद्र बिखर गया।

पहले कैलाशपति, फिर कॉमरेड धन्वंतरि, विद्याभूषण, नित्यानंद वात्स्यायन, विमल प्रसाद जैन और कानपुर के एक पुस्तकालय में निगम भी पुलिस के हाथ आ गए। बावजूद इसके सरकार यह मुकदमा अंत तक नहीं खींच सकी और ट्रिब्यूनल को भंग कर दिया। 27 फरवरी, 1931 को आजाद की शहादत के साथ क्रांति के उस युग का भी अंत हो गया, जिसने स्वतंत्रता के साथ धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद को अपना लक्ष्य बनाया और उसके लिए बलिदान दिए।

आजादी के बाद निगम ने बलिदान शीर्षक से एक पुस्तक लिखी, जिसमें आजाद और दिल्ली के क्रांतिकारी घटनाक्रम के साक्ष्य हैं। निगम अक्सर एक मार्मिक घटना का जिक्र करते थे, ‘22 दिसंबर, 1929 की बात है। मैं जब कॉलेज हॉस्टल में लौटा, तो देखा कि मेरे बड़े कमरे में चार व्यक्ति आपस में बातचीत कर रहे हैं।

ऐसा प्रतीत हुआ कि वे किसी खास विषय पर विचार कर रहे थे। उन सभी के मुख गंभीर थे। मेरे वहां पहुंचने पर तीन व्यक्ति तो चले गए, पर एक भारी-भरकम, हृष्ट-पुष्ट लगभग 22-23 वर्ष का व्यक्ति वहीं रहा। वह सफेद धोती, आधी बांहों वाली कमीज तथा एक ठंडा कोट और पांव में चप्पल पहने हुए था। उसने मुझे नमस्कार किया और मैंने भी।

थोड़ी देर में कैलाशपति आया और मुझे छोटे कमरे में ले जाकर बोला, तुम पंडित जी से मिलने के उत्सुक थे न, आज मैं तुम्हें पंडित जी से मिलवा रहा हूं। मैंने समझा कि पंडित जी कैलाशपति के साथ कहीं बाहर से आए हैं। मेरी कल्पना में वह लंबे-चौड़े शरीर वाले तथा सूट-बूट से सुसज्जित होने थे। एक मिनट बाद वही सज्जन, जिन्होंने मुझे नमस्कार किया था, उस कमरे में आए और बोले, मैं ही पंडित जी हूं।

मैं उनको देखकर अवाक् रह गया। गला भर आया। आंखों में पानी आ गया। मैंने लपक कर उनके पांव छुए, तो उन्होंने मुझे गले लगा लिया और बोले कि अब हम तुम्हारे पास ही रहेंगे। उस दिन से आजाद मेरे साथ मार्च, 1930 के अंत तक रहे। 14 फरवरी को मुझे टाइफायड हुआ, जो कई महीने चला।

आजाद मेरी तीमारदारी करते और डॉक्टर के यहां से दवाई लाते रहे।’ क्रांतिकारी दल के अजेय सेनापति चंद्रशेखर आजाद के इसी विशिष्ट मानवीय पक्ष से हमें अवगत कराते हुए निगम 22 जुलाई, 1980 को हमसे विदा हो गए। करीब सवा सौ साल पुराने हिंदू कॉलेज का परिसर उनकी यादों का सबसे बड़ा साक्षी है।

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