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पाक अधिकृत कश्मीर में चुनाव: अपनों के ही निशाने पर आए इमरान खान

mariana babar मरिआना बाबर
Updated Fri, 30 Jul 2021 06:27 AM IST
इमरान खान
इमरान खान - फोटो : social media
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नियंत्रण रेखा पर खामोशी छाई है और पूरा ध्यान अब उस मुजफ्फराबाद (पाक अधिकृत कश्मीर) पर केंद्रित हो गया है, जहां पिछले दिनों चुनाव हुए। वहां विधानसभा की कुछ सीटों के लिए मुख्य राजनीतिक पार्टियां पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई), पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) और पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज (पीएमएल-एन) जिस आक्रामकता से चुनाव लड़ रही थीं, वह बेहद दिलचस्प थी। मुजफ्फराबाद की समस्याएं शेष पाकिस्तान की समस्याओं से अलग हैं। पर इन समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय राजनीतिक पार्टियों ने चुनाव प्रचार के दौरान एक दूसरे पर जमकर कीचड़ उछाला। वर्षों से यह रवायत बन गई है कि जो भी राजनीतिक पार्टी इस्लामाबाद में सत्ता में होती है, वही मुजफ्फराबाद का चुनाव जीतती है।

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इस बार भी सत्तारूढ़ पीटीआई को सबसे अधिक सीटें मिली हैं और दूसरे नंबर पर आई पीपीपी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है। लेकिन चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं। पिता नवाज शरीफ की जगह अपनी पार्टी की ओर से चुनाव प्रचार का नेतृत्व करने वाली मरियम नवाज ने भी मुजफ्फराबाद के चुनावी नतीजे को मानने से इन्कार कर दिया है। उनकी बात में दम है। बेशक पाकिस्तान में सत्तारूढ़ पार्टी ही मुजफ्फराबाद का चुनाव जीतती है, पर 2021 में ऐसा नहीं हुआ। इस साल पंजाब के उप-चुनावों में पीएमएल-एन को जीत मिली, तो हाल ही में कराची में हुए उप-चुनाव में पीपीपी विजयी रही। मुजफ्फराबाद के चुनावी नतीजे पर सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं, क्योंकि प्रधानमंत्री इमरान खान के एक मंत्री वोटरों को रिश्वत देते हुए कैमरे में पकड़े गए थे।


विपक्ष और सोशल मीडिया द्वारा यह मसला उठाने पर मुख्य चुनाव आयुक्त ने उस मंत्री के मुजफ्फराबाद जाने पर रोक लगा दी थी। उस घटना के अलावा भी इमरान खान के एक मंत्री अली अमीन गंडापुर ने चुनाव प्रचार के दौरान मरियम नवाज के प्रति बेहद भद्दी भाषा का इस्तेमाल किया था। इस कारण स्थानीय लोगों में मंत्रियों के खिलाफ गुस्सा था। पर प्रधानमंत्री या उनके मंत्रियों ने इसके लिए माफी नहीं मांगी। राजनीतिक विशेषज्ञ दुर्दाना नजम की टिप्पणी थी, 'पिछले सप्ताह जब अली अमीन गंडापुर ने मुजफ्फराबाद में अपने भाषण में मरियम नवाज के प्रति बेहद भद्दी भाषा का इस्तेमाल किया, तभी यह साफ हो गया था कि पाक राजनीति में व्याप्त गंदगी अपने चरम पर पहुंच गई है।'
 
राजनीतिक विमर्शों में अपशब्दों का इस्तेमाल समाज के क्षरण के बारे में ही बताता है। 'ऐसा नहीं है कि राजनीतिक मूल्यों में गिरावट सिर्फ पाकिस्तान में ही आई है, लेकिन चूंकि हम दूसरे मोर्चों पर भी बहुत नीचे हैं, ऐसे में, यह नई गिरावट शिष्टाचार और नैतिकता के मामले में फिसड्डी पाकिस्तानी समाज के लिए अतिरिक्त बोझ की तरह है', दुर्दाना नजम कहती हैं। हाल ही में गिलगित-बाल्टिस्तान में भी चुनाव हुए हैं, और वहां का नतीजा भी मुजफ्फराबाद जैसा ही है। उस क्षेत्र की संवेदनशीलता को देखते हुए पाक रक्षा प्रतिष्ठान ने भले चुनावी नतीजे को सत्तारूढ़ पीटीआई के अनुकूल करवाया, पर वहां के मतदाता सरकार के खिलाफ थे। इमरान सरकार ने हाल ही में गिलगित-बाल्टिस्तान को प्रांत का दर्जा दिया है।
 
मुजफ्फराबाद के चुनाव के दौरान इसे भी प्रांत का दर्जा देने की बात चल रही थी। लेकिन मरियम नवाज ने उसका विरोध करते हुए कहा था कि चूंकि यह इलाका विवादास्पद है, लिहाजा पाकिस्तान बलपूर्वक इसे प्रांत घोषित नहीं कर सकता। हालांकि मरियम की उस टिप्पणी को इमरान खान पर दबाव बनाकर चुनावी लाभ हासिल करने की कोशिश के तौर पर देखा गया। पीटीआई अब मुजफ्फराबाद में सरकार बनाने जा रही है, पर इसका पाकिस्तान की राजनीति पर कोई असर नहीं पड़ने वाला और न ही पीटीआई को इसे अपनी बड़ी कामयाबी के तौर पर देखना चाहिए। बल्कि राजनीतिक टिप्पणीकार जाहिद हुसैन का तो कहना है कि पीटीआई को अब मुजफ्फराबाद के जरूरी मसलों का समाधान करना चाहिए। पर यह आसान नहीं होगा, क्योंकि जिन सूबों में पीटीआई की सरकारें हैं, वहां भी समस्याएं जस की तस हैं।  

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