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चुनावी समर में नयापन की तलाश: चुनावों में पर्यावरण मुद्दा क्यों नहीं

anil prakash joshi अनिल प्रकाश जोशी
Updated Mon, 17 Jan 2022 05:23 AM IST

सार

जब महामारी अभी भी जाने का नाम नहीं ले रही, उल्टे लगातार भीषण रूप धर रही है, तब भी अगर इसके प्रति जनमानस में जागरूकता न बन पाए, तो इससे बड़ी विडंबना और कुछ नहीं। दरअसल जन उदासीनता के कारण ही पर्यावरण चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा नहीं बनता।
 
पर्यावरण संकट (सांकेतिक तस्वीर)
पर्यावरण संकट (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : iStock
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विस्तार

पांच राज्यों में फिर विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। इसके साथ ही राजनीतिक दलों के बीच घमासान भी शुरू हो गया है। तमाम तरह के वादों, पुरानी कहानियों, आने वाले समय की रणनीतियों, इन सब के बीच फिर विधानसभा चुनावों की गहमागहमी शुरू हो चुकी है। हकीकत यह है कि देश की आजादी के लगभग 75 साल बीत जाने के बाद भी चुनावी समर में आज तक कोई नयापन दिखाई नहीं पड़ा। वही सड़क-पानी-हवा, वही बिजली की बातें या फिर खोखले किस्म के तमाम दावे और आश्वासन। या फिर रोजगार के मोर्चे पर युवाओं को दिलासा देने वाली खोखली-लुभावनी बातें।

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इन सब मुद्दों पर राजनीतिक दलों के बीच बातचीत और बहस शुरू भी हो गई है। हर बार चुनाव सरकारों के दावे और विपक्ष द्वारा उन दावों को खोखला साबित करने की कोशिश के बीच ही केंद्रित रहते हैं। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों का बिगुल बजते ही एक बार फिर से वही सारी बातें इन राज्यों में भी फिर से शुरू हो गई हैं। वैसे तो वर्ष 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव की भी कमोबेश तैयारियां होने लग गई हैं। हालांकि लगभग दो साल बाद होने वाले लोकसभा चुनाव का नतीजा बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करेगा कि इन पांच राज्यों में विभिन्न राजनीतिक दल किस तरह का प्रदर्शन करते हैं। इस लिहाज से पांच राज्यों में होने जा रहे चुनाव राजनीतिक रूप से बहुत ही महत्वपूर्ण हैं, जो इन राज्यों के नागरिकों के जीवन पर अच्छा-खासा प्रभाव डालने वाले हैं। विधानसभा चुनावों की घोषणा हो जाने के बाद तमाम राजनीतिक दलों का चुनावी अभियान तो जोर-शोर से चल रहा है। लेकिन एक बहुत बड़ा दुर्भाग्य लगातार देखने में यह आया है कि इन तमाम पार्टियों के विमर्श और बहस में प्रकृति और पर्यावरण को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया जाता है, जबकि जलवायु परिवर्तन का संकट लगातार गहराता जा रहा है और लोगों के जन-जीवन एवं आजीविका पर उसका

बहुत ही मारक प्रभाव पड़ रहा है।

शायद ही कोई राजनीतिक दल ऐसा होगा, जिसने बड़े जोरदार और प्रभावी तरीके से पर्यावरण संरक्षण पर आवश्यक गंभीरता दिखाते हुए अपने चुनावी घोषणापत्र में इसको स्थान दिया हो। टुकड़े-टुकड़े में तो हर राजनीतिक दल हर तरह की बात करता है, लेकिन उनमें विरोधी पार्टी पर आक्षेप ही ज्यादा होता है। एक दूसरे की छीछालेदर और यह बताने के सिवा, कि अमुक पार्टी ने प्रकृति व र्प्यावरण को कितना नुकसान किया, और कुछ नहीं होता। हकीकत यह भी है, और जो बहुत चिंताजनक भी है कि इन राजनीतिक पार्टियों के घोषणापत्रों में पर्यावरण और प्रकृति सरंक्षण के वादे पूरी तरह से गायब रहते हैं। इस बार भी कमोबेश वैसी ही स्थिति है। वही घिसे-पिटे तौर-तरीके, वही बातें, वही वादे। जाहिर है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव इन्हीं बातों और वादों पर लड़े जाएंगे। सवाल यह पैदा होता है कि प्रकृति और पर्यावरण के प्रति कुल उदासीनता के लिए क्या राजनीतिक दलों को ही दोषी ठहराया जाए।

कहीं हम भी इस उदासीनता के लिए बराबर के भागीदार तो नहीं? वास्तविकता यह है कि समाज भी आज प्रकृति और पर्यावरण के मुद्दों से परे हटकर कुछ और मुद्दों को ज्यादा महत्वपूर्ण मानता है। इसीलिए राजनीतिक पार्टियों के घोषणापत्रों में पर्यावरण के न होने को वह गंभीरता से नहीं लेता। हालात इतने गंभीर हैं कि पिछले करीब तीन साल से कोविड-19 जैसी महामारी ने पूरी दुनिया के सामने एक बहुत बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। और इस संकट के दौरान बार-बार एक बात यह भी सामने आई कि प्रकृति का बिगड़ता स्वरूप इस महामारी का एक बहुत बड़ा कारण है, जिसे समझना और जिससे सबक लेना बहुत ही आवश्यक है। चाहे वह विश्व स्वास्थ्य संगठन हो या फिर संयुक्त राष्ट्र-सब ने यह बात दोहराई। इसके साथ-साथ यह भी जोड़ा गया कि हमारी जो जीवन-शैली है, वह कोविड के संक्रमण या फिर इसके बहुत घातक होने के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार है।

लेकिन इस पर किसी का ध्यान नहीं जाने वाला। कोई राजनीतिक दल इस पर गंभीरता से न सोचता है और न ही सोचने वाला है। इसके बजाय पूरे चुनाव अभियान में सवाल और मुद्दे यही रहेंगे कि महामारी के दौरान व्यवस्था कैसी थी, कितने बीमारों को दवा नसीब हुई, अभी तक कितने लोगों को टीके लगे हैं, अभी कितने ऐसे लोग हैं, जिन्हें वैक्सीन नहीं लग पाई है, आदि-आदि। राजनीतिक पार्टियां इन मुद्दों पर सिर्फ बहस ही नहीं करेंगी, एक दूसरे पर आरोप भी लगाएंगी। लेकिन वे ज्यादा गंभीर मुद्दों पर विचार करना भी आवश्यक नहीं समझेंगी कि कोविड महामारी के आने और भीषण होने की वजह क्या है और इसका प्रकृति की स्थिति बिगड़ने से क्या लेना-देना है? ये मुद्दे अब भी बहस के मुद्दे नहीं बन पाए हैं।

जब इतने लोग महामारी से पीड़ित हैं, महामारी अब भी जाने का नाम नहीं ले रही, उल्टे लगातार भीषण रूप धर रही है, तब भी अगर इसके प्रति जनमानस में समझदारी और जागरूकता न बन पाए, तो इससे बड़ी विडंबना भला और क्या हो सकती है? ऐसे में हम आने वाले समय में अपने देश और अपने राज्य को, इसकी प्रकृति को और इसके संसाधनों को भला किस तरह संरक्षित कर सकेंगे? लिहाजा पर्यावरण के प्रति इस उदासीनता की जिम्मेदारी राजनीतिक दलों पर कम और हम पर ज्यादा है, क्योंकि हम अभी तक यह समझ ही नहीं पाए हैं कि कोरोना महामारी के कारण पिछले करीब तीन साल में सरकारों की तुलना में हम जनता का नुकसान कहीं ज्यादा हुआ है। पूरी एक पीढ़ी पर इस महामारी का प्रतिकूल असर पड़ा है। कोविड ने बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार से बाहर किया और बेरोजगारी का आंकड़ा भी काफी बढ़ा। हालांकि इस बारे में पूरी तस्वीर सामने आनी अभी बाकी है, जो जाहिर है कि हमें विचलित ही करेगी। लेकिन महामारी का कारण आज भी हमारी बहस का हिस्सा नहीं है।

यह बात हमें बहुत अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि चुनावों में राजनीतिक दलों का व्यवहार कमोबेश वैसा ही होता है, जैसा जनता का रुख होता है। लोग जो कुछ चाहते हैं या उनका जिस तरह झुकाव होता है, राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों और नेताओं के भाषणों में वही सब कुछ झलकता है। ऐसे में हमें चुनावी अवसरों का लाभ उठाते हुए राजनीतिक दलों को प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण के प्रति झकझोरना पड़ेगा, ताकि सत्ता में आने के बाद वे इस दिशा में गंभीरता से ध्यान दे सकें।

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