ये क्या (डा) किया...!

प्रकाश पुरोहित Updated Thu, 14 Mar 2013 11:17 PM IST
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क्या दिन थे...जब मोहल्ले में डाकिये के आने का वक्त होता था, हर घर से एकाध बेचैन नजर टकटकी लगाए सड़क पर बिछी रहती थी। डाकिये की साइकिल की घर्र-घर्र किसी सितार से कम सुरीली नहीं होती थी और दिल की धड़कनें यों तेज हो जाती थीं, जैसे गली में महबूब आ गए हों। उम्मीद रहती थी कि आज तो चिट्ठी आएगी और डर रहता था कि क्या पता, आज भी न आए। सुबह से बढ़ती बेचैनी दोपहर तक तो धौंकनी की तरह हांफने लगती थी। जरा-सी आहट पर लगता था कि कहीं, वो तो नहीं।
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तब के डाकिये का महत्व समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि डाकिया सिर्फ चिट्ठी-पत्री ही नहीं लाता था, वह दुनिया-जहान की खबरें पटक जाता था। वह तब सरकारी नौकर नहीं, चाचा, बाबा, मामा या कुछ और भी हो जाता था। तब किसी डाकिये ने प्रेम-चिट्ठी देते-देते, लेने वाली से प्रेम नहीं किया, बल्कि उसकी मदद ही की है। खत लिख दे सांवरिया के नाम बाबू...! यहां बाबू से तात्पर्य डाकिये से ही है।


चिट्ठी फेंककर भाग नहीं जाया करते थे तब के डाकिए (आज तो ऐसे फेंकते हैं, जैसे बम हो)। आहिस्ते से घर में आते थे। दुनिया-जहान की बातों के बाद चिट्ठी पढ़कर सुनाई जाती थी और हाथों-हाथ जवाब भी लिखने की जिम्मेदारी डाकिये की ही होती थी, क्योंकि तब जवाबी कार्ड का जमाना था। क्या मालूम, कब पोस्ट ऑफिस में कार्ड खत्म हो जाएं, इस डर से जवाबी कार्ड भेजे जाते थे और इसी हरकत की वजह से कार्ड खत्म भी जल्दी हो जाते थे।

डाकिये तब चिट्ठी-पत्री ही नहीं, मुन्नी और डब्बू के लिए रिश्ते भी ले आते थे और यह भी बता देते थे कि कहने को ही मूंछवाले हैं, घर में तो भुनी हुई भांग भी नहीं है। अब रईस लोग भुनी हुई भांग उस समय घर में क्यों रखते थे, यह तो डाकिये ही जानें। घर के हर भले-बुरे कारज में डाकिये का नाम जरूर होता था। डाकिये के पेट में पूरे मोहल्ले की बातें रहती थीं और सही समय पर सही शख्स के सामने ही निकलती थीं।

ये सारी बातें इसलिए याद आ गईं कि किसी डाकिये ने डाक को रद्दी में तौल दिया। अच्छा ही किया, अब चिट्ठी लिखता ही कौन है...! एसएमएस, इंटरनेट जब जिंदगी के राजदार हो गए हैं, तो बेचारे कार्ड को कौन भाव दे। बिल, वसूली का नोटिस, बीमे की रसीद या ऐसी ही चीजें तो आती हैं डाक से। पहले जैसी खुशबू कहां रही अब खतों में। ...तो डाकिया क्यों बांटता फिरे?

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