टोक्यो ओलंपिक: 41 साल बाद मिला मेडल...भारतीय हॉकी की वापसी

Jafar Iqbal जफर इकबाल
Updated Fri, 06 Aug 2021 08:13 AM IST
भारतीय ह़़ॉकी टीम
भारतीय ह़़ॉकी टीम - फोटो : social media
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भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने 41 साल बाद ओलंपिक में पदक जीतकर न केवल करोड़ों देशवासियों को झूमने का अवसर दिया है, बल्कि दुनिया को यह संदेश भी दिया है कि वह फिर से हॉकी में अपनी बादशाहत कायम कर सकती है। ओलंपिक में, जहां दो सौ से ज्यादा देश एक जगह जमा होते हैं और दस हजार से ज्यादा एथलीट हिस्सा लेते हैं, स्थिति सामान्य नहीं, बल्कि विशेष होती है। उसमें खुद को ढालना, फिर खेलना और जीतना आसान नहीं होता। भारतीय टीम का हॉकी में सेमी फाइनल खेलने का उतना महत्व नहीं है, जितना महत्व पदक जीतने का है। यह हमारी पुरुष हॉकी टीम के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। यह एक नई शुरुआत है। 
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मनप्रीत सिंह की कप्तानी में हमारी टीम ने इतिहास रचा है। इससे बड़ा इतिहास क्या हो सकता है कि जिस देश का हॉकी में इतना बड़ा नाम था, वह पदक से दशकों तक दूर रहा और फिर उसने वापसी की। यह तो होना ही था, क्योंकि हमारे खून में हॉकी है। लेकिन हम लोग इतना कम हॉकी खेलने लगे कि हॉकी को परेशानी होने लगी। चाहे हॉलैंड हो, जर्मनी हो, ऑस्ट्रेलिया हो, स्पेन हो, अर्जेंटीना हो या न्यूजीलैंड हो, इन  देशों के मुकाबले में अपने यहां अब हॉकी कम खेली जाने लगी है। और हम समझते हैं कि हम हॉकी के बादशाह थे और आगे भी होंगे। लेकिन बिना खेले ऐसा संभव नहीं है। कांस्य पदक मेरी नजर में रजत पदक से ज्यादा महत्व रखता है। जब आप फाइनल में पहुंच जाते हैं, तब आपका पदक पक्का हो जाता है कि या तो रजत मिलेगा या स्वर्ण। जबकि कांस्य पदक आप दूसरी टीम को हराकर हासिल करते हैं। दूसरी टीम को हराकर पदक जीतने का मनोवैज्ञानिक महत्व ज्यादा होता है। 


देशवासियों की खुशी समझी जा सकती है, क्योंकि हमने जर्मनी जैसी दिग्गज टीम को हराया है, जो चार बार ओलंपिक जीत चुकी है। जर्मनी वह टीम है, जो एक बार बढ़त ले लेती है, तो अपने डिफेंस में सेंध नहीं लगाने देती। यह मैंने बीजिंग ओलंपिक में देखा था, जब मैं वहां गया था। स्पेन और जर्मनी के बीच फाइनल हो रहा था। स्पेन ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था, पर जर्मनी ने एक गोल नहीं करने दिया। भारत ने उस टीम को हराया है, जो 2008 में ओलंपिक विजेता थी। इसलिए इस जीत का महत्व बहुत ज्यादा है। इस पूरे मैच में रोमांच बना रहा। पहले क्वार्टर में तो ऐसा लग रहा था कि पता नहीं, जर्मनी कितने गोल कर देगा। जब भी जर्मनी भारत के साथ खेलता है, वह आक्रामक नहीं होता, बल्कि बहुत सोच-समझकर शुरुआत करता है। 

पर इस मैच में उन्होंने शुरू में ही आक्रामक रुख अपनाया और उनको सफलता भी मिली। पर उन्हें नहीं मालूम था कि इसका दूसरे, तीसरे और चौथे क्वार्टर में खराब असर पड़ेगा। भारी गर्मी व उमस के कारण जर्मन उस गति को बरकरार नहीं रख पाए। दूसरी तरफ हमारी टीम ने इत्मिनान से खेला, जितने भी शॉर्ट कॉर्नर हमें मिले, जितने भी मौके मिले, उसे हमने गोल में बदला। इस रणनीति के जरिये हमने जर्मनी को आक्रामक होने के बजाय रक्षात्मक होने पर मजबूर किया। जितने भी खिलाड़ी फ्रंटलाइन में थे, उनकी सराहना करनी पड़ेगी, चाहे वे सिमरनजीत सिंह हों, शमशेर हों, हार्दिक हों या मनदीप हों-इन खिलाड़ियों को जब भी मौका मिला, इन्होंने गोल दाग दिया। नतीजा यह हुआ कि हमने न केवल स्कोर बराबर किया, बल्कि बढ़त भी बनाई और मैच जीत गए। 

जर्मनी पर इतना दबाव पड़ा कि अंतिम क्षणों में उन्होंने अपना गोलकीपर भी हटा लिया। हमारी टीम के सभी खिलाड़ियों ने काफी मेहनत की। श्रीजेश, दीपेंदर पाल सिंह जैसे खिलाड़ी दस साल से ज्यादा समय से खेल रहे हैं। लेकिन बहुत से खिलाड़ी नए हैं। यही नए खिलाड़ी अगले ओलंपिक में भारत को जीत दिलाएंगे। अगला ओलंपिक बहुत दूर नहीं है। टीम के इस संयोजन को बनाए रखना चाहिए। इस जीत ने हमें आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया है और यह समझाया है कि हम हॉकी में अब भी ऊपर आ सकते हैं, अगर अपनी घरेलू व्यवस्थाएं ठीक रखें तथा ज्यादा से ज्यादा हॉकी खेलें। हॉकी हमारा अपना खेल है। इस खेल को अंग्रेज लेकर आए थे, पर हमने इसमें महारत हासिल की। यह विडंबना ही है कि जिस देश ने दुनिया को हॉकी खेलना सिखाया, वह अब दूसरों से खेलना सीख रहा है। 

आज लोग खेल का महत्व समझते हैं। मुझे अब भी याद है, 1968 में कांस्य पदक जीतना कलंक माना जाता था। हमने कांस्य पदक जीता था, तो बड़ी किरकिरी हुई थी। पर आज हॉकी में कांस्य जीतने पर पूरा देश वाह-वाह कर रहा है। आज सभी खेलों में हम आगे बढ़ रहे हैं। और आगे जाने के लिए हमें खेल को अपनी संस्कृति बनाना होगा। ओलंपिक सिखाता है कि खेल की संस्कृति क्या होती है। जो व्यक्ति बचपन से ही टीम में खेलता है, उसमें किसी तरह का भेदभाव नहीं होता। खेल हम सबको एकजुट कर सकता है। हमारी हॉकी टीम के खिलाड़ियों का आपसी तालमेल निश्चित तौर पर अच्छा रहा, पर महिला हॉकी खिलाड़ियों के मुकाबले उनमें तालमेल कमजोर दिखा। आज हमारी महिला हॉकी टीम भी कांस्य पदक के लिए भिड़ेगी। उसका टीम वर्क पुरुष टीम के मुकाबले बेहतर है। लड़कियों की टीम का कैलकुलेशन इतना टॉप ग्रेड का है कि वे कभी थकी हुई नजर नहीं आईं। उन्होंने खेलते हुए अपना श्रेष्ठ प्रदर्शन किया। 

हो सकता है कि आज वे कमाल कर जाएं और देश के लिए कांस्य पदक जीत लाएं। गरीब घरों की ये बेटियां देश के लिए खेल रही हैं। इसी ओलंपिक में अब तक लड़कियों का प्रदर्शन पुरुषों से बेहतर रहा है। यह बड़ी उपलब्धि है और लोगों को बेटियों को खेलने के लिए प्रेरित-प्रोत्साहित करना चाहिए। खेल राज्यों का विषय है। कई राज्य सरकारें खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करती हैं, जबकि कुछ सरकारें नहीं करतीं। केंद्र सरकार तो खेलों को बढ़ावा दे ही रही है। अगर राज्य सरकारें शिक्षा और खेल पर निवेश करें, तो शिक्षा और खेल की तस्वीर बदल जाएगी। दूसरे देशों में खिलाड़ियों को हर तरह की सुविधाएं दी जाती हैं, जबकि अपने यहां खेल के नाम पर जूते-मोजे के बराबर पैसे खर्च किए जाते हैं। ओलंपिक में मेडल चाहिए, तो इस रवैये से काम नहीं चलेगा। देश में खेलों का प्रचार होना चाहिए और खेलों के प्रति जागरूकता भी बढ़ानी चाहिए।

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