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दिल्ली: दृष्टिबाधितों के लिए दवा की पट्टी पर हो सकता है क्यूआर कोड, डीयू की एसोसिएट प्रोफेसर स्मृति सिंह ने चलाई थी मुहिम

अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: अनुराग सक्सेना Updated Mon, 20 Dec 2021 07:52 AM IST

सार

मैत्रैयी कॉलेज में अंग्रेजी की शिक्षिका डॉ. स्मृति सिंह ने दृष्टिबाधितों को होने वाली परेशानी को देखते हुए हाल ही में दवाई की पट्टी पर क्यूआर कोड अंकित करने का अभियान शुरू किया था। अभियान में उनके साथ सेंट स्टीफेन अस्पताल से वरिष्ठ आर्थोपेडिक सर्जन डॉ. मैथ्यू वर्गीज भी शामिल रहे थे।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : amar ujala
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विस्तार

बाजारों में मिलने वाली दवाईयों की पट्टी पर पर अब जल्द ही एक विशेष क्यूआर कोड दिख सकता है। इससे दृष्टिबाधितों को दवा के बारे में पूरी जानकारी मिल सकेगी। इस नई पहल के पीछे दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के मैत्रेयी कॉलेज में दृष्टिबाधित एसोसिएट प्रोफेसर स्मृति सिंह का प्रयास सफल साबित हुआ है। क्यूआर कोड को स्कैन कर कोई भी व्यक्ति दवा के बारे में पूरी जानकारी को सुन सकता है। इसे लेकर निति आयोग की ओर से डॉ. वीके पॉल ने क्यूआर कोड के लिए उन्हें आश्वासन दिया है।

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दरअसल, मैत्रैयी कॉलेज में अंग्रेजी की शिक्षिका डॉ. स्मृति सिंह ने दृष्टिबाधितों को होने वाली परेशानी को देखते हुए हाल ही में दवाई की पट्टी पर क्यूआर कोड अंकित करने का अभियान शुरू किया था। अभियान में उनके साथ सेंट स्टीफेन अस्पताल से वरिष्ठ आर्थोपेडिक सर्जन डॉ. मैथ्यू वर्गीज भी शामिल रहे थे। दवा की पट्टी पर नेत्रहीन लोगों के लिए कोई विशेष कोड अंकित नहीं होने से नेत्रहीनों को कई बार दवा के बारे में सही जानकारी मिल पाती है।

दवा की पहचान के लिए नेत्रहीन या तो किसी से पूछकर या फिर खुद हाथों से टटोल अंदाजा लगाकर दवाई का पता लगाते हैं। इससे कई बार गलती होने की संभावना बढ़ जाती है। इसको देखते हुए डॉ. स्मृति ने दवाई की पट्टी पर विशिष्ट संकेतों वाले क्यूआर कोड के तहत दवा की मात्रा, दवा का नाम, दवा का जेनरिक नाम, बैच नंबर, उत्पादन तिथि, एक्सपायरी तिथि, दुष्परिणाम समेत अन्य जानकारियों को शामिल करने की मांग की थी। इसे लेकर उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय, स्वास्थ्य मंत्रालय, आयुष मंत्रालय व नीति आयोग से अपील की थी। साथ ही सोशल मीडिया पर भी अभियान चला था। अब उन्हें नीति आयोग से वीके पॉल की ओर से दवाई की पट्टी पर क्यूआर कोड डालने का आश्वासन दिया गया है।

डॉ. स्मृति सिंह के मुताबिक, उनके दो छोटे बच्चे हैं। उनके पति भी दृष्टिबाधित हैं और डीयू में शिक्षक हैं। कोरोना की दूसरी लहर में वह संक्रमण की चपेट में आ गई थीं। इस दौरान वह दवा को टटोलकर पहचान करने की कोशिश करती थी। इससे गलती की संभावना बढ़ जाती थी। वहीं, दवाईयों की एक्सपायरी तारीख के बारे में भी पता नहीं चल पाता था। ऐसे में उन्हें दवाई पर अंकित होने वाले क्यूआर कोड की जरूरत महसूस हुई, जिससे दवाई के बारे में सही जानकारी मिल सके। स्वस्थ होने पर उन्होंने इसे लेकर अभियान शुरू किया था।
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