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UP News: अब भी मन को सालती है विभाजन की त्रासदी, पाकिस्तान छोड़ भारत आए लोगों ने बयां किया दर्द

अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Sat, 20 Aug 2022 04:13 PM IST
सार

1947 में देश के विभाजन के फलस्वरूप पाकिस्तान से भारत आए लोगों की एक अच्छी खासी आबादी गोरखपुर में भी बसती है। ये लोग सिंधी और पंजाबी समाज के हैं। पाकिस्तान से आए तो बिल्कुल खाली हाथ थे। एक बक्से में बस कुछ कपड़े साथ लाए थे। लेकिन, इन्होंने हार न मानी।

बाएं मनोहर नानकानी और राजेश नेभानी।
बाएं मनोहर नानकानी और राजेश नेभानी। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार

देश के विभाजन के वक्त अपना घर, खेतीबाड़ी, कारोबार सब कुछ छोड़ जान बचाकर भारत आए लोगों के परिजनों के मन को विभाजन की त्रासदी अब भी सालती है। इस विभीषिका में अपना सबकुछ गंवाने वालों के सामाजिक पराक्रम को पहचान दिलाने के लिए केंद्र सरकार की ओर से स्मृति दिवस का आयोजन 75 साल पुराने घाव पर मरहम जैसा है।


1947 में देश के विभाजन के फलस्वरूप पाकिस्तान से भारत आए लोगों की एक अच्छी खासी आबादी गोरखपुर में भी बसती है। ये लोग सिंधी और पंजाबी समाज के हैं। पाकिस्तान से आए तो बिल्कुल खाली हाथ थे। एक बक्से में बस कुछ कपड़े साथ लाए थे। लेकिन, इन्होंने हार न मानी। आज न केवल खुद व परिवार को मजबूती से स्थापित किए हुए हैं बल्कि, समाज व देश की तरक्की में भी योगदान दे रहे हैं।


सिर्फ एक कपड़े में भाग कर भारत आए थे हमारे बाप-दादा: मनोहर नानकानी
गोरखपुर महानगर के जटाशंकर चौराहे के पास रहने वाले मनोहर नानकानी बताते हैं कि देश के विभाजन के समय पाकिस्तान के रोड़ी जिलेे के अलीवान से उनका पूरा परिवार किसी तरह जान बचाकर भारत आया था। वहां हिंदू, सिंधी और पंजाबी लोगों के लिए चारों तरफ हाहाकार वाली स्थिति थी। ऐसे में उनके दादा मेघा मल एवं पिता लक्ष्मण दास पूरे परिवार के साथ किसी तरह पानी वाले जहाज से मुंबई पहुंचे। उनसे कहा गया कि उनका सामान दूसरे जहाज से आएगा। सिर्फ शरीर पर के एक कपड़े पहने हुए पूरा परिवार मुंबई पहुंच गया। वहां से किसी तरह मध्यप्रदेश के कटनी रिफ्यूजी कैंप पहुंचे। काम की तलाश में पहले प्रयागराज और फिर गोरखपुर आ गए।

अपनी जान बचाना था सबसे बड़ी चुनौती: राजेश नेभानी
सूरजकुंड निवासी राजेश नेभानी का परिवार सिंध प्रांत के सिक्खर जिले के पन्ना गांव में रहता था। पाकिस्तान में राजेश नेभानी के पिता स्व. भीमन दास का कपड़े का कारोबार था। उन्होंने बताया- पिता जी बताते थे कि विभाजन के समय स्थिति इतनी भयावह थी कि हिंदू परिवारों के लिए अपनी जान बचाना सबसे बड़ी चुनौती थी। रात के अंधेरे में परिवार किसी तरह कराची पहुंचे और फिर पानी वाले जहाज से मुंबई आ गए। रोजी-रोटी की तलाश में परिवार प्रयागराज पहुंचा। वहां पिता जी परिवार चलाने के लिए फेरी लगाकर कपड़ा बेचने का काम करते लगे।

इसके बाद परिवार गोरखपुर शिफ्ट कर गया। फिर से कपड़े के व्यापार में शामिल हो गया। देश के विभाजन के वक्त पाकिस्तान से गोरखपुर आए लोगों का गोरक्षपीठ से संरक्षण मिला। तत्कालीन पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ ने पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को स्थायी रूप से बसाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तो उनके बाद ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ और वर्तमान पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ हर समय अभिभावक जैसा ख्याल रखते हैं।

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