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सरस्वती तीर्थ पर विधि विधान से मनाया गया श्रावणी उपाकर्म

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 12 Aug 2022 02:39 AM IST
Shravani Upakarma celebrated by law on Saraswati Tirtha
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सरस्वती तीर्थ पर ब्राह्मण समुदाय के लोगों ने विधि विधान से श्रावणी उपाकर्म का पर्व श्रद्धा भावना के साथ मनाया। ब्राह्मण समुदाय के लोगों ने पवित्र सरस्वती तीर्थ में स्नान करके ऋषियों, देवताओं और अपने पितरों के निमित्त तर्पण किया। तत्पश्चात उन्होंने अपने पुराने धारण किए यज्ञोपवीत (जनेेऊ) का विसर्जन करके नया यज्ञोपवीत धारण किया। वहीं सालभर में जाने अनजाने में हुए पापों के लिए क्षमा याचना की।

पालिका अध्यक्ष एवं तीर्थ पुरोहित आशीष चक्रपाणि ने बताया कि श्रावणी उपाकर्म ब्राह्मणों का मुख्य पर्व है। श्रावण माह की पूर्णिमा पर इस पर्व पर नक्षत्रों की पूजा की जाती है। यह पूजन कार्य रक्षाबंधन से पूर्व किया जाता है। सुबह ही ब्राह्मण समुदाय के लोग इकट्ठा होकर सरस्वती तीर्थ के विभिन्न घाटों पर एकत्रित हुए। यहां पर ब्राह्मणों ने तीर्थ में डुबकी लगाई और ऋषि, देव और पितृ तर्पण किया। इस विधि के बाद ब्राह्मणों ने नए यज्ञोपवीत का पूजन करके पुराना यज्ञोपवीत का तीर्थ में विसर्जन किया तथा नया यज्ञोपवीत धारण कर लिया।

उन्होंने बताया कि श्रावणी उपाकर्म की पूजा प्रायश्चित के तौर पर की जाती है, जिसमें पूरे साल जाने-अनजाने में हुए पाप और दोषों से मुक्ति के लिए क्षमा याचना की जाती है। इस अवसर पर आशीष चक्रपाणि, रविकांत कौशिक, अनुज अत्री, तरसेम कौशिक, संजय पौलस्त्य, विनोद शास्त्री, गौरव पौलस्त्य, सोनू शर्मा, धर्मवीर अत्री, विनोद पचौली, जयपाल कौशिक बब्बी, राकेश पुरोहित, विवेक पौलस्त्य, मनमोहन चक्रपाणि, सुुुुभाष पौलस्त्य, देवेंद्र रिष्याण सहित अन्य मौजूद रहे।
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श्रावणी उपाकर्म के तीन पक्ष
विनोद पचौली ने बताया कि श्रावणी उपाकर्म के तीन पक्ष प्रायश्चित संकल्प, संस्कार और स्वाध्याय है। प्रायश्चित संकल्प के रूप में गुरु के सानिध्य में ब्रह्मचारी गाय के दूध, दही, घी, गोबर, गोमूत्र तथा पवित्र कुशा से स्नान कर वर्षभर में हुए पाप कर्मों का प्रायश्चित करके जीवन को सकारात्मकता से भरते हैं। स्नान के बाद ऋषि पूजन, सूर्योपस्थान एवं यज्ञोपवीत पूजन तथा नवीन यज्ञोपवीत धारण करते हैं। इसे दूसरा पक्ष कहते हैं। वहीं तीसरे पक्ष में वैदिक परंपरा में वैदिक शिक्षा छह मास तक चलती है।

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