‘हिंदी हैं हम’: अंतरराष्ट्रीय वेबिनार- भाषिक संस्कार ही हमें अपनी संस्कृति से जोड़ते हैं

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: योगेश साहू Updated Tue, 31 Aug 2021 02:53 PM IST

सार

हिंदी हमारी मातृभाषा है। यह विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम है। इसी के जरिये हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। 
हिंदी हैं हम 
हिंदी हैं हम  - फोटो : amar ujala
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विस्तार

हिंदी हमारी मातृभाषा है। यह विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम है। इसी के जरिए हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। हिंदी की लोकप्रियता और पाठकों से उसके रिश्तों को सम्मान देते हुए अमर उजाला ‘हिंदी हैं हम’ अभियान चला रहा है। इसी अभियान की कड़ी में विदेशों में हिंदी के संवाहकों से हिन्दी की स्थिति और उसके संवर्धन के लिए विस्तार से विचार विमर्श किया गया। इस वेबिनार में रेखा राजवंश, कवयित्री और लेखिका (सिडनी, ऑस्ट्रेलिया), सुभाषिनी लता कुमार, हिंदी भाषा और साहित्य की प्राध्यापिका (नेशनल यूनिवर्सिटी, फिजी), डॉ. पुष्पा भारद्वाज, हिंदी अनुवादक और वैलिंगटन में प्रौढ़ों को हिंदी पढ़ाने में योगदान (न्यूजीलैंड), आराधना झा श्रीवास्तव (सिंगापुर), संतोष गुप्ता (ऑस्ट्रेलिया) और नवीन कुमार सिंह (दक्षिण कोरिया) शामिल हुए।
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सबसे पहले रेखा राजवंशी ने ऑस्ट्रेलिया में हिन्दी की स्थिति से अवगत कराया। उन्होंने हिंदी के विकास के लिए सिडनी में सप्ताहांत में हिन्दी अध्यापन कार्य किया। अपने वक्तव्य में यह कहा कि सिडनी में नई पीढ़ी अपनी जरूरतों के लिए हिन्दी सीखना चाहते थे। उनके कुछ विद्यार्थी सिर्फ इसलिए हिन्दी सीख रहे थे क्योंकि उनको भारतीय लड़के-लड़कियों से शादी करनी थी। एक ऑस्ट्रेलियाई लड़की सिर्फ इस लिए हिन्दी सीख रही थी ताकि वह हिन्दी बोलकर अपने होने वाले सास-ससूर का दिल जीत सके। उन्होंने हिन्दी शिक्षण के और भी कई रोचक किस्से सुनाए। रेखा जी ने आगे कहा कि विदेश आकर हम प्रांतों से निकल कर सिर्फ भारतीय होते हैं। यहाँ आकर ज्यादा भारतीय हो जाते हैं। लोग जड़ों से जुड़े रहना चाहते हैं। यहाँ हिन्दी फिल्मों का भी लोगों में काफी क्रेज है।

1980 के दशक में न्यूजीलैंड आईं पुष्पा भारद्वाज ने मातृभाषा को बचाए रखने के लिए अनुवाद और हिन्दी सीखने का काम किया। वहाँ के नए माहौल में वे हिन्दी सुनने को तरस जाती थीं। सिर्फ हिन्दी सुनने के लिए वे एम्बेसी फोन करती थीं। उन्होंने कहा कि हमें अपनी भाषा पर गर्व होना चाहिए। हिन्दी को सम्पूर्ण रूप से बढ़ाना होगा। साहित्यिक और मानक हिन्दी को प्रोत्साहन देना होगा। आगे उन्होंने यह भी चिंता व्यक्त की कि हमें इस पर भी सोचना पड़ेगा की क्या हम नई पीढ़ी के बीच आगे आने वाली 50 वर्षों में हिन्दी को बच पाएंगे? 

कनबेर हिन्दी स्कूल के संस्थापक संतोष कुमार गुप्ता ने कहा कि लोग हिन्दी बोलते वक्त खुद को ही समझते हैं। सोचते हैं कि हिन्दी बोलने पर पूरा सम्मान नहीं मिलेगा। उन्होंने उदाहरण दिया कि जिस तरह जापान, रूस, फ्रांस, जर्मनी आदि के राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री अपनी मातृ भाषा में बोलते हैं उसी तरह हमारे राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री को विदेशों में हिन्दी में ही अपना भाषण देना चाहिए। ताकि हमारे नौनिहालों के मन में अपनी मातृभाषा के प्रति सम्मान का भाव जागे। आगे उन्होंने कहा कि बच्चों को लगता है हिंदी की कोई आवश्यकता नहीं है लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि अपनी मातृभाषा सिर्फ भाषा नहीं है बल्कि उसके साथ अपनी संस्कृति भी जुड़ी हुई है, अगर अपनी भाषा छोड़ देंगे तो अपनी संस्कृति भी छूट जाएगी। 

दक्षिण कोरिया में ऑटोमोबाइल इंजीनियर नवीन कुमार सिंह ने अपना अनुभव बताते हुए कहा कि जब हम जहां जाते है वहाँ की भाषा के साथ वहाँ की संस्कृति सीखते हैं तो वहाँ के लोग भी हमारी संस्कृति और भाषा सीखना चाहते हैं। दक्षिण कोरिया में औद्योगीकरण की शुरुआत से पहले कुछ लगभग भारत जैसा ही था। जब कोई कोरियन नमस्ते करता है तो लगता है कि हमारी भाषा भी यहां है। भाषा संस्कृति को भी जोड़ने का काम करती है। कोरियन कृति का जब इन्होंने हिन्दी में अनुवाद किया तो उसे विश्व भर के हिन्दी पाठकों का स्नेह मिला। हिन्दी और कोरियन का परस्पर प्रेम बढ़ा। नवीन कुमार अपने ब्लाॅग के माध्यम से कोरियन साहित्य को हिंदी में परोसते हैं साथ ही अपने मनोभाव हिंदी में लिखते हैं। 

आराधना झा श्रीवास्तव,  सिंगापुर में रहती हैं और स्वतंत्र लेखन करती हैं। सिंगापुर में कई संस्थाओं के सहयोग से हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए कार्य कर रही हैं। उन्होंने बताया कि सिंगापुर की यह विशेषता है कि यहाँ द्वितीय भाषा के रूप में हिन्दी पढ़ाई जाती है। उन्होंने वहाँ के ऐसे विद्यार्थियों को देखा जो धारा-प्रवाह हिन्दी बोलते हैं। एक विदेशी छात्र ने तो सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता 'लक्ष्मी बाई' धारा-प्रवाह गा कर लोगों को चकित कर दिया। उन्होंने आगे कहा कि हमें भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान के भाव को कभी कम नहीं होने देना चाहिए। एक ही तरह के लोग सभी जगह मिलेंगे। परिवार समाज की प्राथमिक इकाई है इसलिए सभी माता-पिता को अपने बच्चों को भाषा का संस्कार देना चाहिए। विश्व के किसी भी कोने में रह कर अगर ऐसा करेंगे तो हिंदी का भविष्य उज्जवल है। सिंगापुर संगम पहली ऑनलाइन हिंदी पत्रिका है।

फिजी में हिंदी की अध्यापिका सुभाषिनी लता कुमार, ने कहा कि सौ साल पहले जो फिजी आए गिरमिटिया लोगों ने यहाँ हिंदी की शुरुआत की। यह परंपरा तभी से चली आ रही है। फिजी में हिंदी की एक संपर्क भाषा के रूप में शुरुआत हुई। शिक्षा की बात आती है तो यहां कक्षा 1  से 8 तक अनिवार्य रूप से हिंदी पढ़ाई जाती है। वहां हम मानक भाषा का प्रयोग करते हैं। कक्षा 9  से आगे हिंदी छूटने लगती है ऐसे समय में बच्चे घर वालों या रिश्तेदारों के प्रोत्साहित करने पर हिंदी पढ़ते हैं। हिंदी को हमें अपने अस्तित्व से जोड़ें तो हिंदी छूटेगी नहीं। फिजी में मानक हिंदी के साथ-साथ फिजी हिंदी को भी लेकर चलना चाहिए क्योंकि यहां के लोग खासकर जो विदेशी हैं वे मानक हिंदी के बजाय फिजी हिंदी में संपर्क करना चाहते हैं। इस वेबिनार में यह देखने को आया की हमारी हिन्दी प्रगति पर है। लगातार इसका विस्तार हो रहा है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसकी ख्याति बढ़ रही रही। सोशल मीडिया के कारण इसके प्रसार में बल मिला है। भारतवंशियों ने विदेशों में भी हिन्दी का परचम लहराया है। यह सुखद संकेत है। 
 
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