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चुनौती : नीतीश के लिए आसान नहीं राष्ट्रीय राजनीति की डगर, बेहतर समन्वय से सरकार चलाना होगा सबसे बड़ा लक्ष्य

हिमांशु मिश्र, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: योगेश साहू Updated Thu, 11 Aug 2022 04:55 AM IST
सार

सुशासन बाबू के नाम से जाने जाते रहे नीतीश कुमार ने एक बार फिर मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है। न चुनाव हुआ न दलबदल लेकिन बिहार में सरकार बदल गई। यह उनकी पुरानी शैली है। वे असहज करने वाले साझीदार से पल्ला छुड़ाकर नए पार्टनर के सहारे कुर्सी बनाए रखने के सफल बाजीगर साबित हुए हैं। अब नजर इस पर होगी कि जदयू और राजद का यह गठबंधन तमाम सियासी और नीतिगत विसंगतियों के बावजूद कितना सफर तय कर पाएगा...

नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव
नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव - फोटो : ANI
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विस्तार

शपथ के बाद ही बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने विपक्षी दलों से एकजुट होने का आह्वान कर राष्ट्रीय राजनीति में हाथ आजमाने की अपनी महत्वाकांक्षा जाहिर कर दी है। चर्चा यह भी है कि लोकसभा चुनाव से पहले नीतीश अपने डिप्टी सीएम तेजस्वी को सीएम बना कर राष्ट्रीय राजनीति का रुख करेंगे। हालांकि वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति बताती है कि नीतीश के लिए राष्ट्रीय राजनीति की डगर आसान नहीं है।



नीतीश के सामने सबसे पहली और सबसे बड़ी चुनौती बेहतर सरकार चलाने की है। राजद के साथ सरकार चलाने का उनका अनुभव बेहद कड़वा रहा है। खासतौर से कानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार से जुड़े सवाल नीतीश को असहज करते रहे हैं। फिर तेजस्वी समेत राजद के कई नेता भ्रष्टाचार के मामले में केंद्रीय जांच एजेंसियों के निशाने पर हैं। इसके अलावा लालू परिवार में अरसे से सत्ता संघर्ष भी चल रहा है। ऐसे में आने वाला समय नीतीश और इस सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण होगा।




बेहतर सरकार ही है विकल्प
नीतीश के सामने राष्ट्रीय राजनीति में विपक्ष की अगुवाई करने के लिए बेहतर सरकार चलाना ही एक मात्र विकल्प है। नीतीश सरकार चलाते हुए सामाजिक न्याय, महंगाई और केंद्र सरकार के खिलाफ हमलावर रह कर धीरे-धीरे अपनी जगह मजबूत कर सकते हैं।

क्षेत्रीय दलों को साधना टेढ़ी खीर
बिहार में सत्ता परिवर्तन से कांग्रेस समेत कई क्षेत्रीय दल खुश हैं। हालांकि इसका यह मतलब भी नहीं है कि ये सभी नीतीश कुमार का नेतृत्व स्वीकार कर लेंगे। वह इसलिए कि टीएमसी, एनसीपी और टीआरएस के मुखिया अरसे से खुद को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने के अभियान में लगे हैं।

  • ये दल चाहते हैं कि कांग्रेस क्षेत्रीय दलों का नेतृत्व स्वीकार करे। फिर उसमें इन सबकी नेतृत्व करने की अलग-अलग महत्वाकांक्षा है।
  • दूसरी ओर अंतर्विरोध में घिरी कांग्रेस किसी कीमत पर विपक्ष की राजनीति की अगुवाई करने के मामले में समझौते के मूड में नहीं है। इसी कारण कांग्रेस का टीएमसी समेत कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों से टकराव जारी है।

तेजस्वी सात साल में दूसरी बार डिप्टी सीएम  
तेजस्वी यादव सात साल में दूसरी बार डिप्टी सीएम बने हैं। तेजस्वी पहले ही चुनाव में विधायक बने, 33 की उम्र में पार्टी की कमान संभाली और 2020 विधानसभा चुनाव में पार्टी को सबसे अधिक 75 सीटें जितवाईं। तेजस्वी ने कक्षा 9 के बाद पढ़ाई नहीं की लेकिन हर मुश्किल को पहले पढ़ना जानते हैं। क्रिकेट में 12वें खिलाड़ी रहना नहीं भाया और उन्होंने पसंदीदा खेल को अलविदा कहकर राजनीति में सक्रिय हो गए। पिता के जेल जाने के बाद पार्टी की कमान संभाली और विरोधियों को चारो खाने चित किया।

सुशील मोदी को बनाना था सीएम
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा, 2020 के विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा को सुशील मोदी को मुख्यमंत्री बनाना चाहिए था। उन्होंने कहा, सुशील मोदी प्रिय मित्र हैं। अगर भाजपा ने सुशील मोदी को मुख्यमंत्री बनाया होता तो चीजें आज की स्थिति में नहीं पहुंचती।

राजद को दिखाना होगा बड़ा दिल
सरकार चलाने के लिए राजद को दिल बड़ा करना होगा। उसे नीतीश को फ्री हैंड देना होगा। मगर जिस तरह गृह विभाग को लेकर तेजस्वी की बात नीतीश ने नहीं मानी, उससे पता चलता है कि टकराव की गुंजाइश है। फिर नीतीश और तेजस्वी को तेज प्रताप पर काबू रखना होगा।

भाजपा के विभाग राजद को
ऐसी खबरें थी कि कैबिनेट में गृह मंत्री का पद इस बार राजद को जा सकता है, लेकिन जदयू सूत्रों के अनुसार नीतीश ये पद इस बार भी अपने पास ही रखेंगे और मंत्रिमंडल के वो सारे महत्वपूर्ण विभाग राजद को दिए जाएंगे जो पहले भाजपा के पास थे।

राज्यसभा पर पड़ेगा बदलाव का असर, बीजद व वाईएसआर कांग्रेस पर बढ़ेगी भाजपा की निर्भरता
जदयू से राजग की जुदाई का असर राज्यसभा में भाजपा के समीकरण पर भी पड़ेगा। बहुमत से दूरी बढ़ने के कारण पार्टी को अहम बिलों को पारित कराने के लिए अब बीजद व वाईएसआर कांग्रेस जैसे दलों को साधे रखना होगा। भाजपा के लिए राहत की बात यह है कि इन दोनों दलों ने राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति चुनाव के साथ ही अब तक उच्च सदन में कई अहम मौके पर उसका साथ दिया है।
  • जदयू के साथ रहते 237 सदस्यीय राज्यसभा में राजग सदस्यों की संख्या 115 तक पहुंच गई थी।
  • जदयू के राजग से नाता तोड़ने के बाद अब चार मनोनीत व एक निर्दलीय सदस्य के समर्थन के साथ अब राजग के सदस्यों की संख्या 110
  • सरकार शीतकालीन सत्र से पहले तीन और सदस्यों को मनोनीत कर सकती है। इन सदस्यों के समर्थन के बाद राजग सदस्यों की संख्या 113 होगी, मगर तब बहुमत का आंकड़ा 120 होगा।
  • राजग को बहुमत के लिए सात और सदस्य चाहिए।
बीजद-वाईएसआर कांग्रेस से रिश्ते बेहतर
नई लोकसभा में भाजपा के बीजद व वाईएसआर कांग्रेस से रिश्ते बेहतर हैं। ऐसे में भाजपा के लिए उच्च सदन में तात्कालिक समस्या नहीं है। मुश्किलें तब बढ़ेंगी जब इन दोनों दलों में से कोई एक किसी बिल का विरोध करेगा।

उच्च सदन में नए उपसभापति के चुनाव पर भी हो सकता है निर्णय
अब राज्यसभा के उपसभापति को लेकर भी चर्चाएं हो रही हैं। उपसभापति हरिवंश जदयू के सदस्य हैं। सवाल उठ रहे हैं कि क्या नीतीश हरिवंश को पद से इस्तीफा देने के लिए कहेंगे? 14वीं लोकसभा में भी वाम दलों ने यूपीए-1 सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। तब माकपा के सोमनाथ चटर्जी स्पीकर थे। चटर्जी ने पार्टी के निर्देश के बावजूद यह कह कर इस्तीफा देने से इन्कार कर दिया था कि स्पीकर किसी दल का नहीं होता। इसके बाद माकपा ने उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया था।
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