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Explainer: भारत में गिरती प्रजनन दर पर मस्क क्यों चिंतित, इससे कितना नुकसान; खतरे से कैसे निपट रहीं सरकारें?
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Tue, 09 Jun 2026 03:14 PM IST
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भारत में दशक दर दशक घटी प्रजनन दर।
- फोटो : अमर उजाला
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भारत में गिरती प्रजनन दर का मुद्दा इस वक्त चर्चा में है। इसकी वजह है भारत से करीब 14 हजार किलोमीटर अमेरिका में बैठे दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति एलन मस्क का एक बयान। मस्क ने हाल ही में एक्स पर एक पोस्ट में चिंता जताते हुए कहा था कि भारत में जन्म दर अब रिप्लेसमेंट स्तर से नीचे गिर गई है। हालिया वर्षों की बात करें तो मस्क ने ऐसी ही कुछ चेतावनियां जापान और दक्षिण कोरिया को लेकर भी दी थीं। लेकिन अब उनका ध्यान दुनिया के सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले देश- भारत की तरफ है।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर एलन मस्क का पूरा बयान क्या था और इसमें किस ओर इशारा किया गया? भारत में प्रजनन दर गिरने की वजह क्या है? इसका भारत पर क्या असर पड़ सकता है? अब देश में इस समस्या से निपटने के लिए क्या किया जा रहा है? इससे पहले गिरती प्रजनन दर की समस्या किन देशों के सामने खड़ी हुई और उन्होंने इससे निपटने के लिए क्या किया है? आइये जानते हैं...
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर एलन मस्क का पूरा बयान क्या था और इसमें किस ओर इशारा किया गया? भारत में प्रजनन दर गिरने की वजह क्या है? इसका भारत पर क्या असर पड़ सकता है? अब देश में इस समस्या से निपटने के लिए क्या किया जा रहा है? इससे पहले गिरती प्रजनन दर की समस्या किन देशों के सामने खड़ी हुई और उन्होंने इससे निपटने के लिए क्या किया है? आइये जानते हैं...
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क्या है एलन मस्क का पूरा बयान?
टेस्ला और स्पेसएक्स जैसी कंपनियों के मालिक एलन मस्क ने एक्स पर अमेरिकी मैगजीन द इकोनॉमिस्ट की एक रिपोर्ट साझा करते हुए अपना बयान दिया था। उन्होंने जिस रिपोर्ट का ग्राफिक साझा किया उसका शीर्षक था- 'भारत की आबादी जल्द ही कम होने लगेगी, शायद काफी तेजी से।'
किस ओर एलन मस्क का इशारा?
रिप्लेसमेंट स्तर से नीचे जाती प्रजनन दर: मस्क इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाने की कोशिश की है कि भारत की कुल प्रजनन दर (टोटल फर्टिलिटी रेट) अब 2.1 के रिप्लेसमेंट स्तर से नीचे आ गई है। रिप्लेसमेंट स्तर 2.1 होने का मतलब है कि एक दंपति औसतन इतने बच्चे पैदा कर रहा है जो अगली पीढ़ी में उनकी जगह ले सकें। मौजूदा समय में, भारत की प्रजनन दर गिरकर 1.9 रह गई है।इसे सीधे शब्दों में समझें तो भारत में जितने लोगों की मृत्यु हो रही है, उनकी जगह लेने लायक नए जन्म नहीं हो रहे। इससे भारत की आबादी में जल्द ही युवाओं की कमी देखने को मिल सकती है, जो कि लंबी अवधि में भारत की आबादी घटाने वाला साबित होगा। मस्क लंबे समय से यह तर्क देते आ रहे हैं कि दुनिया भर में तेजी से गिरती प्रजनन दरें मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक हैं।
ये भी पढ़ें: India Birth Rate: भारत में घटती जन्म दर पर एलन मस्क ने जताई चिंता, रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे पहुंचा आंकड़ा
भारत में प्रजनन दर गिरने की वजह क्या है?
भारत में आजादी के बाद गरीबी का एक लंबा दौर देखा गया। 1950 में भारत की आबादी लगभग 36 करोड़ थी। इसी दौरान देश में कम संसाधनों के बीच जनसंख्या विस्फोट हुआ, जिससे देश की आबादी तेजी से बढ़ने लगी और 1970 तक यह 54 करोड़ का आंकड़ा पार कर गई। इसका असर यह हुआ कि 1970 के दशक में भारत सरकार और नीति निर्माताओं ने इसे अत्याधिक आबादी की समस्या के तौर पर चिह्नित करना शुरू किया, जिनके लिए संसाधनों की कमी एक बड़ा मुद्दा बनता चला गया। उस समय सरकार का मानना था कि एक अपेक्षाकृत गरीब देश के लिए इतनी बड़ी आबादी का प्रबंधन करने के लिए संसाधन कम पड़ जाएंगे।इसके बाद भारत में जनसंख्या विस्फोट की चिंताएं और उसे नियंत्रित करने के प्रयास शुरू हो गए। जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए सरकार की ओर से कई बड़े कदम उठाए गए, जिनमें लोगों की जबरन नसबंदी करने का एक संक्षिप्त लेकिन बहुत ही विवादास्पद अभियान भी शामिल था। हम दो, हमारे दो जैसे जनसंख्या नियंत्रण अभियान के जरिए सरकार ने परिवार नियोजन का संदेश फैलाने की कोशिश शुरू कर दीं। इन अभियानों का मकसद कम शिक्षित समूहों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी परिवार नियोजन के प्रति जागरूकता बढ़ाना रहा।
कैसे लगातार गिर रही भारत में प्रजनन दर?
1950-2000: जनसंख्या विस्फोट और सरकारी दखल का दौर
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के सदस्य और अर्थशास्त्री संजीव सान्याल के मुताबिक, भारत में जीवित जन्मों की अधिकतम संख्या वर्ष 2001 में ही अपने चरम पर पहुंच गई थी, और उसके बाद से जन्म लेने वाले बच्चों की कुल संख्या में कमी आ रही है।
2010 से 2019: शहरी और ग्रामीण विभाजन के साथ दर में कमी
साल 2014 में भारत की कुल प्रजनन दर 2.3 दर्ज की गई थी। इस दौरान ग्रामीण और शहरी इलाकों में स्पष्ट अंतर देखा गया; जहां ग्रामीण भारत में यह दर 2.5 थी, वहीं शहरी भारत में यह गिरकर 1.8 पर आ गई थी। विशेषज्ञों के मुताबिक, शहरी भारत में प्रजनन दर पिछले 25 वर्षों से रिप्लेसमेंट स्तर (2.1) से नीचे बनी हुई है।इसके बावजूद 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनसंख्या विस्फोट को लेकर चिंता जताई थी, लेकिन वास्तव में 2019-2021 की अवधि तक भारत की कुल प्रजनन दर पहले ही गिरकर 2.0 पर आ चुकी थी।
2020 से अब तक: रिप्लेसमेंट स्तर का और गोता लगाना
- जनसांख्यिकी विशेषज्ञों का अनुमान था कि भारत 2030 से 2035 के बीच रिप्लेसमेंट स्तर (2.1) से नीचे जाएगा। लेकिन, गिरावट की रफ्तार इतनी तेज रही कि भारत ने 2020 के आसपास ही इस आंकड़े को छू लिया।
- 2022 में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के आंकड़ों से यह स्पष्ट हो गया कि सभी समुदायों- हिंदू, मुस्लिम, अन्य में प्रजनन दर तेजी से गिर रही है।
- संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) की 2025 की रिपोर्ट और हालिया सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की कुल प्रजनन दर अब गिरकर 1.9 रह गई है। एक स्थिर जनसंख्या बनाए रखने के लिए 2.1 प्रजनन दर को रिप्लेसमेंट स्तर माना जाता है। यानी इसके बाद से भारत में जनसंख्या का गिरना शुरू होगा।
ये भी पढ़ें: Explainer: क्या है भारत में घटते प्रजनन दर का कारण, क्या होगा इसका असर? कहीं चीन जैसी न हो जाए स्थिति
भारत के कौन से राज्यों में प्रजनन दर सबसे कम, कहां सबसे ज्यादा?
ताजा सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम की रिपोर्ट और अन्य जनसांख्यिकीय आंकड़ों के मुताबिक, भारत के राज्यों में कुल प्रजनन दर (टीएफआर) में बड़ा अंतर देखा गया है।
सबसे कम प्रजनन दर वाले राज्य और केंद्र शासित प्रदेश
- दिल्ली में प्रजनन दर भारत में सबसे कम है। यहां टीएफआर 1.2 बच्चे प्रति महिला दर्ज की गई है।
- इसके बाद केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल का स्थान आता है, जहां प्रजनन दर गिरकर 1.3 पर आ गई है।
- केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ में भी यह दर काफी कम, लगभग 1.4 है।
सबसे ज्यादा प्रजनन दर वाले राज्य
- बिहार में प्रजनन दर पूरे भारत में सबसे आगे है। यहां टीएफआर 2.9 बच्चे प्रति महिला का है।
- इसके बाद उत्तर प्रदेश (2.6), मध्य प्रदेश (2.4), राजस्थान (2.3), छत्तीसगढ़ (2.2) और झारखंड (2.1) का नंबर आता है।
राज्यों में अलग-अलग प्रजनन दर की वजह क्या है?
भारत के अलग-अलग राज्यों (खासकर उत्तर, दक्षिण भारत और ग्रामीण, शहरी क्षेत्रों) में प्रजनन दर के इस भारी अंतर के पीछे मुख्य रूप से आर्थिक विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का स्तर जिम्मेदार है।1. शिक्षा और मानव विकास का स्तर
दक्षिण भारत के राज्य, जैसे- केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और दिल्ली जैसे क्षेत्र जो मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) में बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, वहां प्रजनन दर काफी कम है। इसका सीधा संबंध उच्च शिक्षा और बढ़ती आय से है। इसके विपरीत, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे जिन उत्तरी राज्यों में प्रजनन दर सबसे अधिक है, वे देश के सबसे गरीब राज्य हैं और वहां शिक्षा का स्तर अपेक्षाकृत कम है।
2. शिशु मृत्यु दर और स्वास्थ्य सुविधाएं
कम प्रजनन दर वाले राज्यों, जैसे दिल्ली और दक्षिणी राज्य में स्वास्थ्य सुविधाएं बाकी भारत से बेहतर हैं और वहां शिशु मृत्यु दर बहुत कम है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब शिशु मृत्यु दर कम होती है और माता-पिता को यह विश्वास होता है कि उनके बच्चे वयस्क होने तक जीवित रहेंगे, तो बच्चे पैदा करने की इच्छा कम हो जाती है। इसके उलट बिहार जैसे राज्यों में शिशु मृत्यु दर अधिक होने के कारण प्रजनन दर भी अधिक बनी हुई है।
3. समाज में महिलाओं की स्थिति
दक्षिणी राज्यों में अर्थव्यवस्था के साथ-साथ समाज में महिलाओं की स्थिति और स्वायत्तता का तेजी से विकास हुआ है। जब महिलाओं की शिक्षा तक बेहतर पहुंच होती है, वे कार्यबल में अधिक भाग लेती हैं और घर के फैसलों में उनकी भागीदारी बढ़ती है, तो प्रजनन दर अपने आप कम होने लगती है।4. शहरी जीवनशैली और बढ़ती महंगाई
राज्यों के बीच यह अंतर सिर्फ उत्तर और दक्षिण का नहीं, बल्कि शहरी और ग्रामीण इलाकों का भी है। दिल्ली और चंडीगढ़ जैसे पूरी तरह से शहरी क्षेत्रों में प्रजनन दर बहुत कम (क्रमशः 1.2 और 1.4) है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, शहरों में ऐसा होने की मुख्य दो वजहें हैं...- शादियों में देरी और करियर पर अधिक ध्यान केंद्रित करना।
- शहरों में आवास का बहुत महंगा होना और घरों का आकार छोटा होना।
- बच्चों की परवरिश में लगने वाले भारी वित्तीय निवेश का दबाव।
संक्षेप में कहा जाए तो विशेषज्ञ विकास को ही सबसे अच्छा गर्भनिरोधक मानते हैं। जिन राज्यों ने शिक्षा, स्वास्थ्य (खासकर शिशु मृत्यु दर में कमी) और महिलाओं के सशक्तिकरण में जितनी अधिक प्रगति की है, वहां प्रजनन दर उतनी ही तेजी से नीचे आई है।
एनएफएचएस और इकोनॉमिस्ट की रिपोर्ट को देखा जाए तो स्पष्ट है कि भारत में गिरती प्रजनन दर का असर तुरंत नहीं दिखेगा, लेकिन लंबी अवधि में यह देश के जनसांख्यिकीय, आर्थिक और राजनीतिक ढांचे में बड़े बदलाव लाएगा।
गिरती प्रजनन दर का भारत पर क्या असर पड़ सकता है?
एनएफएचएस और इकोनॉमिस्ट की रिपोर्ट को देखा जाए तो स्पष्ट है कि भारत में गिरती प्रजनन दर का असर तुरंत नहीं दिखेगा, लेकिन लंबी अवधि में यह देश के जनसांख्यिकीय, आर्थिक और राजनीतिक ढांचे में बड़े बदलाव लाएगा।
1. आबादी तुरंत कम नहीं होगी
भारत की कुल आबादी अगले कुछ दशकों तक बढ़ती रहेगी। इसके पीछे मुख्य कारण जनसंख्या गति है। भारत की आबादी अभी भी काफी युवा है, जिसका अर्थ है कि हर साल करोड़ों लोग प्रजनन आयु में प्रवेश कर रहे हैं, इसलिए प्रति महिला बच्चों की संख्या कम होने के बावजूद जन्मों की कुल संख्या उच्च बनी रहेगी।2. देश में बढ़ेगा उम्र का बोझ
अनुमान है कि 2050 तक भारत की लगभग 20% आबादी (करीब 30 करोड़ लोग) 60 वर्ष से अधिक उम्र की हो जाएगी। इससे देश का निर्भरता अनुपात (डिपेंडेंसी रेश्यो) बदल जाएगा, यानी सिकुड़ती हुई कामकाजी आबादी पर आश्रित बुजुर्गों का बोझ काफी बढ़ जाएगा।
3. डेमोग्राफिक डिविडेंड से चूकने की आशंका
फिलहाल भारत की कामकाजी आबादी (15-59 वर्ष) बढ़ रही है और देश डेमोग्राफिक डिविडेंड यानी आर्थिक विकास का वह दौर जब काम करने वाले लोगों की संख्या आश्रितों से ज्यादा होती है के दौर से गुजर रहा है। लेकिन विशेषज्ञों को डर है कि अगर जन्म दर इसी तरह गिरती रही, तो 30 से 40 वर्षों में भारत का श्रम बल छोटा होने लगेगा। इसके कारण भारत इस डेमोग्राफिक डिविडेंड का पूरी तरह से आर्थिक लाभ उठाने से पहले ही इसे खो सकता है।
4. राजनीतिक और वित्तीय विवाद (दक्षिण बनाम उत्तर)
इस जनसांख्यिकीय बदलाव का एक बहुत बड़ा असर भारत की राजनीति पर पड़ता दिख रहा है। दक्षिण भारतीय राज्यों, जिन्होंने अपनी प्रजनन दर को तेजी से कम किया है, में यह चिंता बढ़ रही है कि आने वाले परिसीमन में जनसंख्या के आधार पर संसद में उनकी सीटों की संख्या कम हो सकती है। इसके अलावा, केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को दिए जाने वाले वित्तीय संसाधनों के बंटवारे को लेकर भी उत्तर भारत, जहां आबादी ज्यादा है और दक्षिण भारत के बीच बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो सकता है।
देश में इस समस्या से निपटने के लिए क्या किया जा रहा है?
भारत में गिरती प्रजनन दर की समस्या से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने अभी तक कोई राष्ट्रव्यापी नीति का एलान नहीं किया है। हालांकि, इस जनसांख्यिकीय बदलाव के प्रभावों को देखते हुए कुछ राज्य सरकारों ने अपने स्तर पर लोगों को ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करने के कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।वित्तीय प्रोत्साहन की शुरुआत
दक्षिण भारतीय राज्यों में प्रजनन दर काफी तेजी से गिरी है, इसलिए वहां के नेता सक्रिय रूप से परिवारों को अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। उदाहरण के लिए आंध्र प्रदेश सरकार ने घोषणा की है कि वह तीसरे बच्चे के जन्म पर परिवारों को 30,000 रुपये और चौथे बच्चे के जन्म पर 40,000 रुपये की आर्थिक सहायता देगी।
मुफ्त आईवीएफ सुविधाएं
गोवा, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों ने पहली बार माता-पिता बनने वाले लोगों के लिए राज्य-वित्तपोषित आईवीएफ केंद्र शुरू किए हैं। इसका उद्देश्य उन जोड़ों की मदद करना है जो बच्चा पैदा करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें चिकित्सा संबंधी बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।
पहले कौन से देश देख चुके हैं घटती आबादी की समस्या?
जापान और दक्षिण कोरिया: ये दोनों देश घटती आबादी और बुढ़ापे के संकट से जूझने वाले सबसे प्रमुख देश हैं। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, दक्षिण कोरिया में प्रजनन दर गिरकर लगभग 0.75 बच्चों प्रति महिला रह गई है, जो दुनिया में सबसे कम है। वहीं, जापान दुनिया के सबसे अमीर देशों में से एक होने के बावजूद दशकों से इस संकट से जूझ रहा है।
चीन और ताइवान: कभी अपनी बड़ी आबादी के लिए जाना जाने वाला चीन भी अब तेजी से घटती प्रजनन दर का सामना कर रहा है। विश्व बैंक के मुताबिक, चीन की प्रजनन दर 1.0 पर आ गई है, जबकि ताइवान में यह आंकड़ा और भी नीचे लगभग 0.86 तक पहुंच गया है।
यूरोपीय देश: इटली और जर्मनी जैसे कई उन्नत और विकसित यूरोपीय देश भी घटती जन्म दर और तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी की समस्या से लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं।
वियतनाम: यहां दशकों तक प्रजनन दर में गिरावट जारी रही, जिसके बाद स्थिति को संभालने के लिए सरकार को 2025 में अपनी दो-बच्चों की नीति को खत्म करना पड़ा।
सिंगापुर और हांगकांग: इन देशों ने भी 1960 के दशक के बाद अपनी जनसांख्यिकी में बड़े बदलाव देखे और विकसित अर्थव्यवस्था बनने के साथ ही वहां प्रजनन दर में कमी आई।
क्या इन देशों को मिला घटती आबादी की समस्या का हल?
जनसंख्या के घटने की समस्या से जूझ रहे देशों ने कई तरीके आजमाए हैं, जिनके जरिए वे अपनी आबादी को फिर बढ़ाने की कोशिश में जुटे हैं। हालांकि, इसमें कोई खास सफलता अब तक नहीं मिली है। अलग-अलग स्टडीज के मुताबिक, एक बार जब किसी समाज में कम बच्चे पैदा करने का चलन स्थापित हो जाता है, तो सरकारों के लिए इसे पलटना बहुत मुश्किल होता है। चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों की सरकारों ने लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए भारी वित्तीय सहायता और परिवार-समर्थन कार्यक्रमों पर अरबों डॉलर खर्च किए, लेकिन फिर भी वे इस गिरावट को रोकने में नाकाम रहे हैं।अन्य वीडियो