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कुरुक्षेत्र: क्षत्रपों की हार से भाजपा हुई ताकतवर तो कांग्रेस को मिला नेतृत्व का नया अवसर

Vinod Agnihotri विनोद अग्निहोत्री
Updated Tue, 09 Jun 2026 09:40 AM IST
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Kurukshetra: BJP strengthened by defeat of regional leader, Congress gains a new opportunity for leadership
लड़ाकू दल में बदल रही कांग्रेस! - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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एक-एक करके ज्यादातर क्षेत्रीय क्षत्रपों की चुनावी शिकस्त के बाद आखिरकार लंबे समय के बाद विपक्षी इंडिया गठबंधन की बैठक दिल्ली में हुई और शुरुआती गिले-शिकवे के बाद सबने एक बार फिर एकजुट होकर पांच मुद्दों पर सरकार को घेरने का एलान किया। जिस समय ये बैठक हो रही थी करीब उसी समय तृणमूल कांग्रेस के करीब 20 सांसदों ने संसद में पार्टी से अलग होकर एनडीए के साथ जाने का फैसला भी कर लिया। पहले विधायक दल और अब लोकसभा में संसदीय दल की टूट ने ममता बनर्जी को और कमजोर कर दिया है। लेकिन बैठक में जिस तरह ममता को हाथों-हाथ लिया गया उससे संकेत है कि विपक्ष उनके लड़ाकू तेवरों का राष्ट्रीय स्तर पर इस्तेमाल करेगा। ममता के सामने भी इसके अलावा अब कोई चारा नहीं है कि वह कांग्रेस के साथ कदमताल करके राष्ट्रीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखें।


चर्चा या अटकलें कांग्रेस में तृणमूल में विलय की भी चल रही हैं लेकिन फिलहाल अभी इस पर कोई ठोस बातचीत दोनों दलों के बीच नहीं हुई है। लेकिन सोनिया के साथ ममता के आत्मीय रिश्ते इसके लिए जमीन तैयार कर सकते हैं। विपक्षी दलों की यह कवायद अगर सड़क पर एकजुट संघर्ष के रूप में विकसित नहीं होती है तो सिर्फ नेताओं की फौरी एकता से कुछ खास होने वाला नहीं है। जब तक अपने पांच मुद्दों पर सारे विपक्षी दल सड़क पर ईमानदारी से अपने कार्यकर्ताओं को एकजुट होकर नहीं उतारते तब तक उनके जनाधार और कार्यकर्ताओं की एकता व्यवहारिक नहीं होगी और इंडिया गठबंधन सिर्फ नेताओं की चाय पार्टी से ज्यादा कुछ नहीं कर पाएगा। फिलहाल क्षत्रपों की हार से भाजपा और एनडीए सरकार को नई ताकत मिली है तो विपक्षी गठबंधन में अपना नेतृत्व स्थापित करने का अवसर भी प्राप्त हुआ है।
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बंगाल में भाजपा की प्रचंड जीत के बाद तृणमूल कांग्रेस के विधायक दल और बाद लोकसभा में संसदीय दल में टूट ने विपक्ष के क्षेत्रीय किलों में सबसे मजबूत किले को ध्वस्त कर दिया है। इसके पहले महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों में महाविकास अघाड़ी गठबंधन की शर्मनाक हार से शिवसेना उद्धव ठाकरे और एनसीपी शरद पवार के किले भी ढह चुके थे। कांग्रेस वैसे भी यहां विपक्षी राजनीति में एक तिहाई हिस्सेदार ही है। उसके बाद दिल्ली में आम आदमी पार्टी की हार ने अरविंद केजरीवाल की चमक को धुंधला कर दिया। अब पंजाब ही फिलहाल आप का सहारा है। बंगाल से पहले बिहार में भी राजद कांग्रेस वामदलों के महागठबंधन को महज 35 सीटों पर समेट कर एनडीए ने जबरदस्त जीत दर्ज की और अब वहां भाजपा ने अपने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में पहली बार अपनी सरकार बनाई है और जनता दल यूनाइटेड अब वहां महज साझीदार है। तमिलनाडु में फिल्म स्टार थलपति विजय की टीवीके के हाथों सत्तारूढ़ डीएमके की हार और उसके बाद कांग्रेस का टीवीके सरकार में शामिल होने से विपक्ष के एक और बड़े छत्रप को गद्दी से उतार दिया। कुल मिलाकर अब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ही एक मजबूत क्षेत्रीय दल के रूप में भाजपा को 2027 के विधानसभा चुनावों में चुनौती देगी और पंजाब में आम आदमी पार्टी को अपने बचे हुए किले को बचाने की चुनौती है।
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अब सवाल ये है कि लगातार होते जा रहे अपने क्षत्रपों के पराभव के बाद देश में विपक्ष की राजनीति अब किस दिशा में जाएगी। 2023 में भाजपा सरकार के खिलाफ बना विपक्षी दलों का इंडिया गठबंधन अब सिर्फ नाम के लिए ही बचा है। इसके प्रणेता नीतीश कुमार सबसे पहले अलग हुए फिर उनका अनुसरण रालोद के जयंत चौधरी ने किया। दोनों ने एनडीए की शान और ताकत दोनों बढ़ाई।लोकसभा चुनावों में भी इंडिया गठबंधन किसी गठबंधन की तरह चुनाव नहीं लड़ा। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने इंडिया गठबंधन को खड़ा ही नहीं होने दिया और वहां कांग्रेस वाम मोर्चा तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़े। पंजाब में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी आमने सामने थे जबकि दिल्ली में उनका गठबंधन था। केरल में वाम मोर्चा और कांग्रेस नीत यूडीएफ के बीच सीधा मुकाबला था। चुनाव के बाद आम आदमी पार्टी ने तुरंत खुद को इंडिया गठबंधन से बाहर किया। अब तमिलनाडु में डीएमके ने खुद को इससे अलग कर लिया है और टीवीके ने अभी तक इंडिया गठबंधन में आने की कोई घोषणा नहीं की है।

उधर,  पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का किला न सिर्फ ढहा है बल्कि तृणमूल कांग्रेस के करीब साठ विधायकों ने ममता के फैसले के खिलाफ निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी को सदन में अपना नेता चुनकर विधानसभा अध्यक्ष से इसकी मंजूरी भी ले ली है। यह दल विभाजन के महाराष्ट्र मॉडल से थोड़ा अलग है। हालांकि इसमें भी महाराष्ट्र की तरह बागी खेमा ममता बनर्जी को ही अपना नेता बता रहा है जैसा कि महाराष्ट्र में अजित पवार और उद्धव खेमों ने अलग होने के बावजूद शरद पवार और बाला साहब ठाकरे को अपना नेता बताया था। लेकिन जहां महाराष्ट्र में विभाजन के बाद दोनों खेमे सत्तारूढ़ भाजपा के साथ सरकार में शामिल हो गए लेकिन पश्चिम बंगाल में बागी खेमा विधानसभा में विपक्ष की भूमिका में ही रहना चाहता है। दल विभाजन का यह नया बंगाल मॉडल है। तमिलनाडु में पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई ने भाजपा से अलग होकर नई राजनीतिक पार्टी बनाने का एलान किया है।

इन तमाम बदलते हालात में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और एनडीए से बाहर दूसरे क्षेत्रीय दलों के सामने दो ही रास्ते हैं। पहला ये कि वो कथित इंडिया गठबंधन ऐसे ही ढीले-ढाले अंदाज में चलाते रहें और अपने अपने राज्यों में कांग्रेस को जूनियर साझेदार बनाकर पहले की तरह भाजपा और एनडीए से लड़ते हुए अपने लिए नई संभावनाएं तलाशें और कांग्रेस भी किसी राष्ट्रीय गठबंधन की बजाय 2004 के राजनीतिक मॉडल पर चलते हुए राज्यवार अलग-अलग दलों के साथ अपने गठबंधन और सीटों के तालमेल करे। फिर 2029 के चुनावों में अधिकतम सीटों पर लड़कर अगर सरकार बनाने की नौबत आए तब यूपीए जैसा चुनाव बाद कोई राष्ट्रीय गठबंधन बनाए। दूसरा रास्ता है कि सभी क्षेत्रीय दल कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार करके राहुल गांधी को अपना नेता मानें और एक समान साझा कार्यक्रम तैयार करके आगे होने वाले विधानसभा चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनावों की एकजुट होकर तैयारी करें।

इंडिया गठबंधन या जो भी इसका नाम दिया जाए उसका एक मुकम्मल ढांचा बनाए और सारे चुनाव अलग-अलग न लड़कर पूरी तरह एकजुट होकर लड़े जाएं। इससे जनता में विपक्षी गठबंधन की साख बनेगी और भाजपा व एनडीए विरोधी मतदाता इसे एक मुकम्मल विकल्प के रूप में देख सकेंगे। अगर कांग्रेस समेत सारे घटक दल ईमानदारी से इस पर अमल करेंगे, तब जाकर 2029 तक भाजपा नीत एनडीए सरकार के मुकाबले के लिए कोई राजनीतिक विकल्प तैयार हो सकेगा। लेकिन उसके पहले विपक्षी गठबंधन 2027 में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और गुजरात के विधानसभा चुनावों में बेहतर प्रदर्शन करना होगा। कांग्रेस को पंजाब, उत्तराखंड चुनाव जीतने होंगे और हिमाचल में अपनी सरकार फिर बनानी होगी। वहीं गुजरात में बेहतर प्रदर्शन करना होगा। जबकि उत्तर प्रदेश में सपा-कांग्रेस को हर हालत में चुनावी जीत दर्ज करानी होगी। इसके बाद 2028 में होने वाले कर्नाटक व तेलंगाना में कांग्रेस को अपनी सरकारें वापस लानी होंगी और राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जीतने के लिए पूरा जोर लगाना होगा। तब जाकर वह 2029 में भाजपा के मुकाबले तन कर खड़ी हो सकेगी और भाजपा विरोधी क्षेत्रीय दलों का नेतृत्व कर सकेगी।

जहां तक कांग्रेस का सवाल है तो 2024 के बाद एक एक करके विपक्षी क्षत्रपों के किले ढहने से भले ही इंडिया गठबंधन की ताकत कमजोर हुई और उसे झटका लगा है लेकिन कांग्रेस के लिए एक अवसर भी आ गया है। कांग्रेस जिस तरह 2023 में छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश हारी, फिर लोकसभा चुनावों के बाद हरियाणा, महाराष्ट्र में उसकी पराजय हुई उससे यह एक कहा जाने लगा कि जहां भी कांग्रेस भाजपा से मुकाबला करती है वो हार जाती है। हालांकि कांग्रेस भाजपा से मुकाबला करके 2018 में ये तीनों राज्य और 2023 में कर्नाटक जीत चुकी थी, लेकिन भाजपा और उसके सहयोगी दलों से ज्यादा यह बात विपक्षी क्षेत्रीय दलों के नेताओं ने कहनी शुरू की और यह मांग उठने लगी कि कांग्रेस की जगह विपक्षी इंडिया गठबंधन की कमान ममता बनर्जी जैसी मजबूत लड़ाकू नेता को सौंपी जाए। यह मांग अरविंद केजरीवाल ने शुरू की और इसे दबी जुबान से अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, शरद पवार, उद्धव ठाकरे ने भी स्वर दिया। सिर्फ इस मुद्दे पर स्टालिन चुप रहे। कांग्रेस के पास भी इसका कोई माकूल जवाब नहीं था, इसलिए उसने इस पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। लेकिन अब जब समाजवादी पार्टी के सिवा सारे क्षेत्रीय दल भाजपा से सीधी लड़ाई में परास्त हुए और तमिलनाडु में डीएमके को एक नए दल ने हरा दिया तो क्षेत्रीय क्षत्रपों के सुर भी नरम हो गए हैं और उत्तर प्रदेश समाजवादी पार्टी के लिए कांग्रेस से गठबंधन जरूरी बन गया है। उधर भले ही कांग्रेस असम हार गई हो लेकिन केरल में उसकी सरकार बनने और तमिलनाडु में सरकार में शामिल होने से दक्षिण भारत के पांच में से चार राज्यों की सत्ता पर वह काबिज हो गई है और उसका दबदबा कुछ बढ़ गया है। कार्यकर्ताओं और नेताओ का मनोबल भी बढ़ा है।

कांग्रेस में पिछले लंबे समय से नेतृत्व के स्तर पर जारी जड़ता टूटती नजर आ रही है और फैसले हो रहे हैं। कर्नाटक में जिस तरह कांग्रेस ने सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने के लिए राजी करके डीके शिवकुमार को सत्ता सौंपी है उससे उसके कुशल राजनीतिक प्रबंधन का संकेत मिलता है। केरल में भी जिस तरह राहुल गांधी के बेहद भरोसेमंद केसी वेणुगोपाल और राज्य के वरिष्ठतम व पार्टी और गांधी परिवार के बेहद वफादार नेता रमेश चेन्निथला के दावों को दरकिनार करके नए जुझारू नेता वीडी सतीशन को मुख्यमंत्री बनाया वह भी नेतृत्व की दृढता का ही संकेत है। राज्यसभा चुनावों में जिस तरह पार्टी के निष्ठावान नेताओं कार्यकर्ताओं को टिकट दिया गया उससे भी लगता है कि पार्टी ने अपनी पिछली गलतियों से कुछ सीखा है। मध्य प्रदेश में दिग्गज कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की जगह मीनाक्षी नटराजन, झारखंड में सुबोधकांत सहाय, फुरकान अंसारी जैसों के दावों को नजरंदाज करके वर्षों से पार्टी का काम देख रहे प्रणव झा और कर्नाटक से पार्टी के बेहद मुखर नेता पवन खेड़ा को उतारा गया है। उससे इन सारे फैसलों पर राहुल गांधी की छाप स्पष्ट दिखाई पड़ती है।

पिछले काफी समय से जिस तरह राहुल गांधी मोदी सरकार और भाजपा से हर मुद्दे पर लगातार सीधी टक्कर ले रहे हैं और उनके उठाए हर मुद्दे पर केंद्र सरकार और भाजपा को न सिर्फ जवाब देना पड़ रहा है बल्कि राहुल द्वारा उठाए गए सवालों पर बनने वाले जनमत के दबाव में सरकार को कुछ मामलों में न सिर्फ अपने कदम पीछे खींचने पड़े बल्कि जाति जनणना जैसी बातों को मानना भी पड़ा है। अब जिस तरह राहुल नीट पेपर लीक और सीबीएसई के गड़बड़झाले पर छात्रों और युवाओं से मुखातिब हैं, केंद्र सरकार की निकोबार परियोजना के विरोध में खुलकर उतर आए हैं, अर्थव्यवस्था और गैस, डीजल, पेट्रोल की बढ़ती कीमतों और महंगाई को लेकर लगातार हमलावर हैं ऐसे में पुरानी थकी हुई कांग्रेस एक लड़ाकू दल में बदलती जा रही है। नीट और सीबीएसई के मुद्दों पर कई शहरों में कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई के जोरदार प्रदर्शन, दलितों पिछड़ों के सवाल पर होने वाले प्रदेशवार सम्मेलन और टीवी बहसों में कांग्रेस प्रवक्ताओं की बढ़ती आक्रामकता इसका स्पष्ट संकेत हैं।

उधर, लगातार चुनावी सफलताओं से उत्साहित भारतीय जनता पार्टी विपक्ष के बिखराव को अपने लिए शुभ मान रही है और कांग्रेस की आक्रामकता को वह महज सियासी खीज मानकर खारिज कर रही है।भाजपा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्मे, अमित शाह की रणनीति और संघ भाजपा के संगठन और सरकारी तंत्र की अपनी ताकत पर बेहद भरोसा है। इसलिए उसे लगता है कि ईरान-अमेरिका युद्ध की वजह से जो थोड़ा बहुत आर्थिक संकट पैदा हुआ है उसे भी समय के साथ हल कर लिया जाएगा और चुनावों में उसका हिंदुत्व का नैरेटिव फिर कारगर साबित होगा। उत्तर प्रदेश में भाजपा को योगी आदित्यनाथ की बुलडोजरी अपील, उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार के कामकाज सक्रियता और दोनों राज्यों में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और अमित शाह के चुनाव प्रबंधन पर पूरा भरोसा है। पार्टी नेताओं का मानना है कि सपा और कांग्रेस के पास इनका कोई जवाब नहीं है।

वहीं, पंजाब में भाजपा अपने संगठन और विस्तार की सभी संभावनाओं पर काम कर रही है। पश्चिम बंगाल की सफलता ने उसका हौसला बढ़ाया है और इसीलिए कांग्रेस के आए भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ को बदलकर कांग्रेस से ही दो बार विधायक रहे जट सिख व्यवसायी ढिल्लों को प्रदेश भाजपा की कमान सौंपी है। इसके पहले आप नेता राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा के साथ पंजाब के छह राज्यसभा सासंदों का विलय भाजपा में कराकर एक नया दांव चला है। इन सांसदों में आम आदमी पार्टी के रणनीतिकार और अरविंद केजरीवाल के खास विश्वस्त संदीप पाठक और ईडी छापों की जद में आए एक विश्वविद्यालय के मालिक सांसद भी शामिल हैं। भाजपा ने यह दांव पंजाब में आम आदमी पार्टी के नेताओं कार्यकर्ताओं का मनोबल कमजोर करने के लिए चला है। पार्टी को शहरी क्षेत्रों में जहां अपने पुराने जनाधार को और बढ़ाने का भरोसा है तो ग्रामीण क्षेत्रों में जट सिख को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर नया संदेश देने की कोशिश की है। कांग्रेस से ही भाजपा में गए पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह पौत्र रवनीत सिंह बिट्टू को चुनाव हारने के बाद राज्यसभा में भेजकर केंद्र में रेल राज्यमंत्री बनाकर भी जट सिखों को संदेश दिया जा चुका है।

पार्टी सूत्रों के मुताबिक, जट सिखों को लुभाने के लिए जल्दी ही कुछ और फैसले भी हो सकते हैं। भाजपा सूत्रों के मुताबिक पार्टी में एक राय अकाली दल के साथ चुनावी गठबंधन की है लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पंजाब का फैसला गृह मंत्री अमित शाह पर छोड़ रखा है। अमित शाह की कोशिश है कि चुनाव के पहले जितना भी हो सकता है भाजपा को राज्य में मजबूत किया जाए उसके बाद जमीनी फीडबैक लेकर जो भी सही होगा वही फैसला किया जाएगा। अगर भाजपा के अकेले लड़ने की सूरत बनी तो पार्टी सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और अगर गठबंधन की जरूरत हुई तो अपनी शर्तों पर ज्यादा हिस्सेदारी के साथ अकाली दल से गठबंधन किया जाएगा। इसके अलावा भाजपा को 2027 में हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस को हराकर अपनी सरकार बनाने और गुजरात में फिर से जीतने की पूरी उम्मीद है। पार्टी को 2028 में कर्नाटक के लिए अब अपनी रणनीति फिर से बनानी होगी, क्योंकि डीके शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद भाजपा को उनके मुकाबले का कद्दावर नेता खड़ा करना होगा।कर्नाटक में भाजपा में गुटबाजी चरम पर है। पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा और भाजपा के संगठन महासचिव बीएल संतोष के खेमों के बीच खासी तनातनी है। फिर उसे लिगायत, वोक्कालिंगा, ओबीसी, ब्राह्मण आदि सामाजिक समीकरणों को नए सिरे से साधना होगा।

2028 के आखिर में होने वाले राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में भाजपा के सामने कठिन चुनौती राजस्थान में है। वहां लोकसभा चुनावों में भी भाजपा को झटका लग चुका है। जबकि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को अभी अपना घर ठीक करना होगा। ओडिशा में भाजपा फिलहाल विपक्ष की चुनौती से दूर है और तेलंगाना में उसे त्रिकोणीय मुकाबले में अपने लिए जगह बनानी है। भाजपा ज्यादातर चुनावों को लेकर बेहद आशान्वित है और उसे लगता है कि चुनाव आयोग द्वारा चलाई जा रही एसआईआर की प्रक्रिया से भी उसे बिहार, बंगाल जैसा फायदा हो सकता है। सत्ता पक्ष और विपक्ष इन सारी चुनावी परीक्षाओं में उतरने के बाद 2029 के लोकसभा चुनावों की परीक्षा में जाएंगे।
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