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दांपत्य जीवन : वैवाहिक रिश्ते की टूट जब अपरिहार्य हो जाए

Monika Sharma मोनिका शर्मा
Updated Fri, 14 Jan 2022 06:06 AM IST

सार

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट, प्रोग्रेस ऑफ द वर्ल्ड्स वीमन 2019-2020 के मुताबिक भारत में परिवारों के टूटने के मामलों में बढ़ोतरी हुई है। आकंड़े बताते हैं कि देश में लगभग 14 लाख लोग तलाकशुदा हैं, जो कुल आबादी का करीब 0.11 फीसदी और विवाहित आबादी का 0.24 प्रतिशत हिस्सा है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

बीते दिनों तलाक के एक मामले को मंजूरी देते हुए पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने कहा कि अगर विवाह टूट चुका है, तो तलाक न देना दोनों पक्षों के लिए विनाशकारी होगा। सभी पक्षों को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता 2003 से अपनी पत्नी से अलग रह रहा है। विवाह पूरी तरह से टूट चुका है और इनके दोबारा साथ रहने की कोई संभावना नहीं है। ऐसे में न्यायिक फैसले से विवाह को पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता। 

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शादी में मानवीय भावनाएं शामिल होती हैं और यदि वे खत्म हो जाएं, तो अदालत के फैसले से उन्हें बहाल करने की कोई संभावना नहीं होती है। गौरतलब है कि क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक के लिए दाखिल इस अर्जी को गुरुग्राम की फैमिली कोर्ट ने खारिज कर दिया था। अब तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए हाई कोर्ट ने गुरुग्राम की परिवार अदालत का 2015 का फैसला रद्द कर पक्षकारों को तलाक की अनुमति दी है।


मौजूदा सामाजिक-पारिवारिक परिवेश में बिखराव के शिकार वैवाहिक रिश्ते का यह मामला और न्यायालय की टिप्पणी दोनों विचारणीय हैं। देश में ऐसे मामलों की संख्या बढ़ रही है, जिनमें शादी के रिश्ते में आई उलझनों को सुलझाने में न मध्यस्थता काम करती है और न ही आपसी समझ। कानूनी दबाव तो ऐसे संबंधों को पुनर्जीवन दे ही नहीं सकता। ऐसे में व्यावहारिक रूप से देखा जाए, तो अलग हो जाना दोनों ही पक्षों के जीवन की सहजता के लिए जरूरी है। 

हमारे यहां अलगाव के ऐसे मामलों में तेजी से इजाफा हुआ है, जिनमें साथ रहने-जीने के दौरान ही नहीं, तलाक लेने के मोर्चे पर भी उलझनें कायम रहती हैं। कभी कानूनी जटिलता, तो कभी व्यक्तिगत अहं। निबाह न होने की स्थितियों में भी न केवल रिश्ता टूटता है, बल्कि यह बिखराव भी सालों-साल चलता है। ऐसे में न्यायालय का निर्णय घिसटते-रिसते रिश्ते पर विराम लगाकर जिंदगी में आगे बढ़ने की बात कहता है।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट, प्रोग्रेस ऑफ द वर्ल्ड्स वीमन 2019-2020 के मुताबिक भारत में परिवारों के टूटने के मामलों में बढ़ोतरी हुई है। आकंड़े बताते हैं कि देश में लगभग 14 लाख लोग तलाकशुदा हैं, जो कुल आबादी का करीब 0.11 फीसदी और विवाहित आबादी का 0.24 प्रतिशत हिस्सा है। हाल के कुछ बरसों में मुंबई और लखनऊ जैसे शहरों में शादीशुदा जीवन में अलगाव के मामले 200 प्रतिशत तक बढ़े हैं। युवा और कामकाजी जोड़ों की बड़ी जनसंख्या वाले शहर बेंगलुरु में तलाक के बढ़ते मामलों के कारण नए फैमिली कोर्ट खोलने पड़ गए थे। 

यह कटु सच है कि रिश्तों की गुत्थियां जब सुलझने के बजाय और उलझती जाएं, तो कानूनों का दुरुपयोग भी होने लगता है। कभी अहं की संतुष्टि, तो कभी अपनों या कानूनी सलाहकारों के बहकावे। कुछ समय पहले पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने ही आईपीसी की धारा 498 ए  के दुरुपयोग के खिलाफ भी अपनी चिंता व्यक्त की थी। कहना गलत नहीं होगा कि इस कानून को प्रतिशोध लेने या जानबूझकर परेशान करने का हथियार बनाकर भी इस्तेमाल किया जा रहा है। वैवाहिक रिश्तों में बढ़ती कटुता के चिंतनीय हो चले हालातों में अलगाव को लेकर भी परिपक्व समझ दिखाने की दरकार है।

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