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SC: सार्वजनिक जगहों, सरकारी दफ्तरों में संविधान की प्रस्तावना लगाने की मांग, सुप्रीम कोर्ट का सुनवाई से इनकार

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Amit Mandal Updated Fri, 30 Sep 2022 04:23 PM IST
सार

अदालत ने याचिकाकर्ता जेड ए एन अहमद पीरजादे की ओर से पेश वकील से कहा कि या तो याचिका वापस ले ली जाए या अदालत इसे खारिज कर देगी।

मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि कोर्ट यहां सभी चीजों को ठीक करने के लिए नहीं है।
मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि कोर्ट यहां सभी चीजों को ठीक करने के लिए नहीं है। - फोटो : Social Media
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विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया जिसमें केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को संविधान की प्रस्तावना को स्थानीय भाषाओं में सार्वजनिक स्थानों और सरकारी कार्यालयों में बंधुत्व की भावना को बढ़ाने के लिए प्रदर्शित करने का निर्देश देने की मांग की गई थी। शीर्ष अदालत ने कहा कि कुछ तो सरकार पर छोड़ दिया जाना चाहिए कि इस पर कैसे अमल किया जाए। न्यायमूर्ति एस के कौल और न्यायमूर्ति ए एस ओका की पीठ ने महाराष्ट्र के याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील से कहा कि कुछ लोग वास्तव में मेहनती हैं। निर्वाचित हो जाओ और ऐसा करो। यह इसके लिए जगह नहीं है। पीठ ने कहा कि यह हमारा काम नहीं है।



वापस ली गई याचिका 
अदालत ने याचिकाकर्ता जेड ए एन अहमद पीरजादे की ओर से पेश वकील से कहा कि या तो याचिका वापस ले ली जाए या अदालत इसे खारिज कर देगी। वकील ने कहा कि वह याचिका वापस ले लेंगे। अधिवक्ता एम आर शमशाद के माध्यम से दायर याचिका में अधिकारियों को सार्वजनिक स्थानों और सरकारी कार्यालयों में स्थानीय नागरिकों द्वारा समझी जाने वाली भाषाओं में भाईचारे की भावना और स्वतंत्रता, समानता और धर्मनिरपेक्षता के विचारों को बढ़ाने के लिए प्रस्तावना की सामग्री को प्रदर्शित करने के लिए निर्देश देने की मांग की गई थी।


अदालत ने मजाकिया अंदाज में पूछा, पूरे देश में संविधान का प्रदर्शन क्यों नहीं? यह सरकार को करना है। याचिका में कहा गया था कि हाल के दिनों में देश के विभिन्न हिस्सों में फैली हिंसा में वृद्धि हुई है। जनता के बीच असहिष्णुता का स्तर कई गुना बढ़ गया है और देश के युवा उस प्रतिबद्धता से अनजान हैं जिस पर हमारी संवैधानिक नींव रखी गई है। याचिकाकर्ता ने पहले राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अधिकारियों से संपर्क किया था लेकिन कोई कदम नहीं उठाया गया। इसमें कहा गया कि याचिकाकर्ता हमारे देश के विभिन्न हिस्सों में सांप्रदायिक हिंसा के मामलों, घृणा अपराधों और घृणास्पद भाषणों के बढ़ने का गवाह रहा है। यह भारत की क्षेत्रीय सीमाओं के भीतर बढ़ रहा है और याचिकाकर्ता सामाजिक ताने-बाने के क्षरण से गहराई से चिंतित है।  

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