लेफ्टिनेंट जनरल ढिल्लों बोले: कश्मीर की जड़ों पर किया जा रहा हमला, आज अगर चुप रहे तो भविष्य में दुनिया सवाल पूछेगी

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू Published by: प्रशांत कुमार Updated Fri, 22 Oct 2021 05:40 AM IST

सार

लेफ्टिनेंट जनरल ने कहा, हमें यह समझने की जरूरत है कि हमारी जड़ों पर हमला किया जा रहा है। चाहे वह शिक्षा हो, व्यवसाय हो, आजीविका हो और ऐसा करने वाले हमारे दोस्त नहीं हो सकते। इसे एक आम कश्मीरी को समझना होगा। 
सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिल्लों
सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिल्लों - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार

घाटी में आतंकवादियों द्वारा की जा रही टारगेट किलिंग के बीच वरिष्ठ सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिल्लों ने कहा है कि अब समय आ गया है कि कश्मीर के लोगों को अपनी भावनाओं पर काबू पाने के साथ इस तरह की घटनाओं की निंदा करनी चाहिए, ताकि न सिर्फ आने वाली पीढ़ियों को बचाया जा सके बल्कि उनकी परेशानियों का भी अंत हो सके। 
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रक्षा खुफिया एजेंसी के महानिदेशक और एकीकृत रक्षा स्टाफ के उप प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिल्लों ने यहां बीबी कैंट में चल रही पांच दिवसीय सेमिनार में कहा कि निर्दोष नागरिकों पर इस तरह के हमलों में शामिल लोग समाज की जड़ों को निशाना बना रहे हैं और ऐसे लोग कभी भी कश्मीर के दोस्त नहीं हो सकते।


कहा कि पिछले तीन दशकों के दौरान कश्मीरी समाज को नुकसान हुआ है और कश्मीर की जड़ों पर चोट पहुंचाई गई। आज कोई भी निर्दोषों की हत्या के खिलाफ नहीं बोल रहा है। यह कुछ ऐसा है कि लोगों ने हर चीज के बारे में बोलने का अधिकार खो दिया है। दुनिया बाद में पूछेगी कि जब आप निर्दोष हत्याओं पर चुप थे, तो अब आपको क्यों सुना जाना चाहिए। उन्होंने लोगों से चुनिंदा मामलों में ही प्रतिक्रिया व्यक्त करने के सिंड्रोम से उबरने का आग्रह किया।
 

संघर्ष काल के बच्चों का मनोविज्ञान समझना होगा

ले. जनरल ढिल्लों ने कहा, वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, कश्मीर की 62 प्रतिशत आबादी 32 वर्ष से कम आयु की है और आज यह लगभग 66 प्रतिशत हो गई होगी। इसका अर्थ है कि 66 प्रतिशत आबादी इन तीन दशकों (आतंकवाद) के दौरान पैदा हुई थी और इस प्रकार ये संघर्ष काल के बच्चे हैं। उन्होंने कहा, वे बंदूक संस्कृति, हमलों, कर्फ्यू, हड़ताल और कार्रवाई के दौरान पैदा हुए और बड़े हुए। वे अपने मन-मस्तिष्क पर एक निशान के साथ बड़े हुए हैं। वे कट्टरता और दुष्प्रचार के साये में बढ़े हैं... यह एक समस्या है और हमें उनके मनोविज्ञान को समझने की जरूरत है।

 

जीवन भर तड़पती हैं कश्मीरी बच्चों की माताएं

ले. जनरल ढिल्लों ने कहा कि किस पर दोष लगाया जाए और हारने वाला कौन है? हारने वाला एक कश्मीरी पत्नी है, हारने वाली एक कश्मीरी मां है। कश्मीरी मां क्योंकि उसका बच्चा ठीक से स्कूल नहीं जा सका, उचित शिक्षा नहीं मिली। जिसके बच्चे को मदरसे में धकेल दिया गया और उसे ऐसी शिक्षा दी गई कि वह आतंकी तंजीमों में शामिल हो गया और  एक दिन या एक साल के भीतर अपनी जान गंवा दी। ऐसे बच्चों की माताएं जीवन भर तड़पती हैं। उन्होंने कहा, उस मां का दुख आतंकवाद की सड़ांध से उपजा है और हमें इसे एक समाज के रूप में संबोधित करने की जरूरत है।

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कश्मीर का इतिहास इंसानियत और सूफीयत का

विदेश में हवाई अड्डों पर सुरक्षा जांच के दौरान एक उदाहरण का हवाला देते हुए लेफ्टिनेंट जनरल ढिल्लों ने कहा कि पश्चिमी दुनिया में किसी को पाकी (पाकिस्तानी) कहना एक गाली है और क्या आप (कश्मीरी) ऐसा समाज बनना चाहते हैं। क्या हम उस ओर बढ़ रहे हैं? जबकि हमारे पास 5000 से अधिक वर्षों का समृद्ध शांति पूर्ण इतिहास है। यह इतिहास सह-अस्तित्व, कश्मीरियत, इंसानियत और सूफीयत पर आधारित है। 

 

पर्यटन को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं दहशतगर्द

उन्होंने कहा कि हाल ही में आतंकवादियों द्वारा बेगुनाहों की हत्या का आर्थिक पक्ष संभावित पर्यटकों को होटल बुकिंग रद्द करने के लिए प्रेरित करने के लिए आतंक पैदा करना था ताकि आम लोग पीड़ित हों और अपने आतंकवादी समूहों के लिए चारा बन जाएं। युवा कश्मीरी का मुख्य आर्थिक आधार पर्यटन है। यह यात्रा (तीर्थयात्रा), ट्रेकिंग, गुलमर्ग में स्कीइंग हो सकता है... पर्यटक आते हैं और अर्थव्यवस्था में योगदान करते हैं, चाहे भारतीय या विदेशी मुद्रा में। शांति नहीं होगी तो कौन आएगा? हमने अतीत में ऐसे मौसम देखे हैं जब कोई पर्यटक नहीं था और स्थानीय लोग पीड़ित थे।

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कश्मीर की जड़ों पर किया जा रहा हमला

लेफ्टिनेंट जनरल ने कहा, हमें यह समझने की जरूरत है कि हमारी जड़ों पर हमला किया जा रहा है। चाहे वह शिक्षा हो, व्यवसाय हो, आजीविका हो और ऐसा करने वाले हमारे दोस्त नहीं हो सकते। इसे एक आम कश्मीरी को समझना होगा। उन्होंने 1990 के दौरान उत्तरी कश्मीर में एक अधिकारी के के रूप में कार्य किया और नियंत्रण रेखा के साथ-साथ भीतरी इलाकों में सुरक्षा को देखते हुए 15वीं कोर का नेतृत्व भी किया।

 

1990 में भी चुप रहा था आबादी का बड़ा हिस्सा

ले. जनरल ढिल्लों ने जनवरी 1990 में उत्तरी कश्मीर के कु पवाड़ा जिले में अपनी तैनाती के दौरान की एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि जब घाटी में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद भड़क उठा तो इससे प्रभावित लोगों और इसमें शामिल लोगों का प्रतिशत समान था, लेकिन 80 से 90 फीसदी आबादी ऐसी घटनाओं पर चुप रही। यही कश्मीरी पंडितों के कश्मीर छोड़ने के लिए बनाया गया था। कश्मीरी पंडित घाटी में शिक्षा व्यवस्था के मुख्य आधार थे। 1989-90 में जब आतंकवाद शुरू हुआ, तब सबसे पहले स्कूलों को जला दिया गया था। जिन लोगों ने ऐसी घटनाओं को अंजाम दिया वह नहीं चाहते थे कि यहां के बच्चे देश के अन्य हिस्सों की तरह शिक्षा प्राप्त कर सकें।
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