डेढ़ घंटे की मुलाकात, बादल का एक टुकड़ा भर है...

अमृता प्रीतम
                
                                                             
                            डेढ़ घंटे की मुलाकात 
                                                                     
                            
जैसे बादल का एक टुकड़ा 
दिया सूरज के साथ टांक
उधेड़ हारी हूं 
पर कुछ नहीं बनता 
और लगता है 
कि सूरज के लाल कुर्ते में 
यह बादल किसी ने बुन दिया...

डेढ़ घंटे की मुलाकात 
सामने उस चौक में 
एक संतरी की तरह खड़ी 
और ख़्याल का गुज़रना
उसने हाथ देकर रोक दिया 

खुदा जाने मैंने क्या कहा था 
और जाने ख़ुदा तूने क्या सुन लिया...

डेढ़ घंटे की मुलाक़ात 
सोचती हूं आदिवासी औरत की तरह 
मैं एक चिलम सुलगा लूं 
और डेढ़ घंटे का तंबाकू 
इस आग पर रखकर पी लूं....

इससे पहले कि मेरी सोच घबराये
और ग़लत मोड़ पर मुड़ जाये 
इससे पहले कि बादल को उतारते 
यह सूरज टूट जाये 

डेढ़ घंटे का धुआं 
कुछ तो मैं पी लूं, पवन पी ले 
इससे पहले कि इसका लफ़्ज 
मेरी या तेरी ज़बान पर आये 
इससे पहले कि मेरा या तारा कान 
इस जिक्र को सुने-

और इससे पहले कि मर्द- 
औरत-जात की तौहीन बन जाए 
और इससे पहले कि औरत- 
मर्द-ज़ात के अपमान का कारण बने 
इससे पहले...इससे पहले....

- अमृता प्रीतम 

साभार : अमृता प्रीतम , चुनी हुई कविताएं (भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित)



 
 
4 years ago

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