हरिवंशराय बच्चन: तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों का निमंत्रण 

हरिवंशराय बच्चन: तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों का निमंत्रण
                
                                                             
                            तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
                                                                     
                            
आज लहरों में निमंत्रण !

   1-
रात का अंतिम प्रहर है,
झिलमिलाते हैं सितारे ,
वक्ष पर युग बाहु बाँधे
मैं खड़ा सागर किनारे,
         वेग से बहता प्रभंजन
         केश पट मेरे उड़ाता,
    शून्य में भरता उदधि -
    उर की रहस्यमयी पुकारें;
इन पुकारों की प्रतिध्वनि 
हो रही मेरे हृदय में,
है प्रतिच्छायित जहाँ पर 
सिंधु का हिल्लोल कंपन 
तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
आज लहरों में निमंत्रण ! आगे पढ़ें

6 months ago

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