विज्ञापन

गिरिराज शरण अग्रवाल की कविता: मेरी झोली में आकाश

गिरिराज शरण अग्रवाल की कविता: मेरी झोली में आकाश
                
                                                                                 
                            इतना बड़ा आकाश
                                                                                                

मेरी झोली में आ जाए
मैंने बार-बार सोचा था
अब जब
आकाश मेरे पास आ रहा है
तो मेरी झोली
बहुत छोटी हो गई है ।

आकाश को समेटने की इच्छा
हर कोई करता है
किंतु झोली का आकार
बढ़ सके
आकाश को समा लेने को ख़ुद में
ऐसी कोशिश यहाँ
कौन करता है ?
1 month ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X