जयशंकर प्रसाद: तुम कनक किरन के अंतराल में

Jaishankar Prasad tum kanak kiran ke antral main
                
                                                             
                            तुम कनक किरन के अंतराल में
                                                                     
                            
लुक छिप कर चलते हो क्यों ?
 
नत मस्तक गवर् वहन करते
यौवन के घन रस कन झरते
हे लाज भरे सौंदर्य बता दो
मोन बने रहते हो क्यो?
 
अधरों के मधुर कगारों में
कल कल ध्वनि की गुंजारों में
मधु सरिता सी यह हंसी तरल
अपनी पीते रहते हो क्यों?
 
बेला विभ्रम की बीत चली
रजनीगंधा की कली खिली
अब सांध्य मलय आकुलित दुकूल
कलित हो यों छिपते हो क्यों?
3 months ago

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