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सुभद्राकुमारी चौहान की कविता- भैया कृष्ण ! भेजती हूँ मैं राखी अपनी, यह लो आज

कविता
                
                                                                                 
                            भैया कृष्ण ! भेजती हूँ मैं
                                                                                                

राखी अपनी, यह लो आज।
कई बार जिसको भेजा है
सजा-सजाकर नूतन साज।।

लो आओ, भुजदण्ड उठाओ
इस राखी में बँध जाओ।
भरत - भूमि की रजभूमि को
एक बार फिर दिखलाओ।।

वीर चरित्र राजपूतों का
पढ़ती हूँ मैं राजस्थान।
पढ़ते - पढ़ते आँखों में
छा जाता राखी का आख्यान।।

मैंने पढ़ा, शत्रुओं को भी
जब-जब राखी भिजवाई।
रक्षा करने दौड़ पड़ा वह
राखी - बन्द - शत्रु - भाई।। आगे पढ़ें

1 month ago

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