दाग़ की ग़ज़लों की शोहरत में इन सुरीली आवाज़ों का भी बड़ा रोल रहा है...

दाग़ की ग़ज़लों की शोहरत में इन सुरीली आवाज़ों का भी बड़ा रोल रहा है...
                
                                                             
                            वाणी प्रकाशन से प्रकाशित किताब 'दाग़ देहलवी: ग़ज़ल का एक स्कूल' में निदा फाज़ली लिखते हैं-  "दाग़ का बुढ़ापा, आर्थिक संपन्नता होते हुए भी बेसुकून गुज़रा, बीवी के देहांत ने उनके अकेलेपन को ज़्यादा गहरा कर दिया था, जिसे बहलाने के लिए वह एक साथ कई तवायफ़ों को नौकर रखे हुए थे। इनमें साहिबजान, उम्दाजान, इलाहीजान, जद्दन बाई और सूरत की अख़्तर जान ख़ास हैं। ये सब दाग़ के दरबार की मुलाज़िम थीं। दाग़ से इन तवायफ़ों का रिश्ता शाम की महफ़िलों तक ही था।
                                                                
                
                
                 
                                    
                     
                                             
                                                
                                             
                                                
                                             
                                                
                                             
                                                
                                             
                                                
                                                                
                                        
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5 months ago

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