विज्ञापन

अंधेरा सा पसर जाने लगा

                
                                                                                 
                            अंधेरा सा पसर जाने लगा
                                                                                                

जो सूरज लौट के घर जाने लगा

शायद मोहब्बत कम हो गई
तुम्हारा तो जी भर जाने लगा

दौड़ ज़िन्दगी की कैसे जीतेगा
जो चलते चलते ठहर जाने लगा

फ़िक्र तो रातों की है मुझे
दिन किसी तरह गुजर जाने लगा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
1 month ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X