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उल्टे सीधे बैठकर कुछ सोच रहा हूँ

                
                                                                                 
                            बैठकर उलटे सीधे मैं कुछ सोच रहा हूँ,
                                                                                                

सूखे पत्तों को देखकर मैं कुछ सोच रहा हूँ|

हाथ पर हाथ धरे उन्ही की बेकरारी है,
पाँव पर पाँव धरे उन्ही की इंतजारी है,
कोई ख्यालों को जेहन मे बहुत नोच रहा हूँ,
बैठकर उलटे सीधे मैं कुछ सोच रहा हूँ|

गाल पर उँगलियों की छाप चढ़ी जाती है,
होंठ पर प्यार की मुस्कान जड़ी जाती है,
मिट गयी थी जो लकीर उसे खरोंच रहा हूँ,
बैठकर उलटे सीधे मैं कुछ सोच रहा हूँ|

आँख झुकती है कभी आँख कभी उठती है,
मेरे चेहरे पे जो रह रह के सिकन गिरती है,
अपनी बाहों से खुद बदन को दबोच रहा हूँ,
बैठकर उलटे सीधे मैं कुछ सोच रहा हूँ|

-आर्यव्रत आनन्द 'शुभम'

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1 year ago

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