विज्ञापन

रोटी के मंजर

                
                                                                                 
                            पेट से शुरू होती है
                                                                                                

आंखो में नजर आ जाती है
भूखे से पूछो
रोटी कितने मंज़र दिखलाती है
कभी मजहब का भेद मिटती है
कभी यातना कभी रण भी करवाती है
खाली पेट गर्मी में देह जलाती है
सर्दी में देह कपकपाती है
ये रोटी कितने मंज़र दिखलाती है
कहीं दूर कोई बच्चा जब खाली पेट सोता होगा
कभी जब कोई भूख से बिलखता रोता होगा
जब मां अपने बच्चों को रोटी ना दे पाती होगी
खुद ही खुद में खुद को कितना बेबस वो पाती होगी
ये बात यही सिखलती है ,
ये रोटी कितने मंज़र दिखलाती है
किसी की आंखो से आंसू बन उतर आती है
किसी शायर की रोशनाई में रंग जाती है
ये बात जो अमीरों की थाली से बोहोत दूर नजर आती है
रोटी का एक मंज़र मै भी देख पाया हूं
भूख महसूस की तो रोटी पे लिख पाया हूं ।
 
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करे
8 months ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X