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आह्वान

                
                                                                                 
                            हर शाम, उदासी के सायों मे लिपटी
                                                                                                

मेरे मौन अधरों की पुकार
बेचेन सागर का सीना चीर
दूर तक किसी का आह्वान करती है।

व्याकुल हृदय की धड़कन
सागर की लहरों से
लय मिलाने लगती है -
किन्ही बेमानी-अधूरी ख़्वाहिशों
का ज्यों अनुर्वर मंथन
छोड़ जाता है जो निस्संदेह मुझे हताश
सिमटने-सुकड़ने, फिर से समाने
अपने एकल-अस्तित्व के कवच में
मानों मजबूरी का बन अंग।

आसमान की गहराईओं में खोया
पंछी भी लौट आता है
हर शाम नीड़ में अपने-
पर बह जाता है मेरा मन
लौटती लहरों पे हो सवार
और डूबती है हर रोज़ बेबाक
उम्मीदों की किश्ती सूरज के संग।

--बिमल सहगल

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4 months ago

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