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असीवकृत ज़िंदगी

                
                                                                                 
                            वक़्त की दीमक से खाये खोखल बरगद से बिखरी
                                                                                                

फिर से ज़मीन को तलाशती ज़ीर्ण टहनियों से झूलती
हताश बाहें फैलाए सूखती, उलझती, बेमानी सी
हवाई जड़ों के जाल में फंसी बेदम–बेसहाय ज़िंदगी l

झंझावात के थपेड़ों सी झंझोड्ति, टटोलती - खंगालती
चौथे पहर में उन कसक भरी, बिसरी यादों की दुहाई दे
कभी अपने रहे, दूर जा खड़े रिश्तों को बेबस पुकारती
काल की दहलीज़ पे आ खड़ी अकेली, दम तोड़ती ज़िंदगी l

इसके जीवनदाई फलों से तृप्त-सशक्त हो इसी की डालों को
नई पीड़ी ने चोंचों में भर, अतिजीवन का अमृत चख, जड़ पंखों ने
ऊंची उड़ान भर निज नीड़ों में उन्हें संजो एक नया ताना-बाना बुन,
दूर एकल में अपना भविष्य रचा है पितरनिष्ठा के कर्ज़ को झुठला l

वर्तमान की भाग-दौड़ में पीछे छूटी यूं ही थकी-हारी
किन्ही सन्नाटों मेँ खोये इतिहास के ज़र्द-झड़ते पन्नों की मानिंद
बुझते दीयों की रोशनी संध्या काल की गरम बयार में
फड़फड़ा रही है हर मजबूर, असहाय-असीवकृत ज़िंदगी

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5 months ago

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