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किताबें ज़िंदगी

                
                                                                                 
                            न भूले वो , जो उठा जवान महफ़िल को अलविदा कह के
                                                                                                

ग़ैर-हाज़िर ही थे वो, जो बैठे रहे इंतज़ार-ए-शमा गुल होने के ।

जीना बस वही, जब तक ज़िंदा-दिली रगों में धड़के
वर्ना क्या जीना सिर्फ सांसों की डोर से बेबस लटके।

पियें चाहे शाम से, सुबह का सूरज जब तक न चमके
मगर सुरूर तो वही जो खाली पैमाने से भी छलके ।

चलें ज़िन्दगी की बेमज़ा किताब में फिर से भटके
ख़ुद नक्श करें वो सफ़े,  खाली रहे जो तक़दीर से बचके ।

गुमशुदी की गलियों से निकले , मंज़िल अपनी ख़ुद निशान करके
ख़ुदी से ख़ुद को रौशन करें ऐसा, कि ख़ुदाई हमीं से चमके ।


- बिमल सहगल
द्वारका , नयी दिल्ली। 


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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2 years ago

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