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लफ़्जों का जाल

                
                                                                                 
                            महज़ लफ़्ज़ों का है इक जाल, शायरी जिसे कहते
                                                                                                

बेशक किसी ज़ुबान के मोहताज एहसास नहीं होते ।

लिख लिख यह दीवाने यूं ही दीवान काले करते
पर भला स्याही से नक्श गुलाब कहां महकते ।

यह नज़्में यह ग़ज़लें , फ़क्त दिल बहलाने की बातें
चंद मीठे अल्फ़ाज़ों से मनाये कहां रूठे रब जाते।

किताबें - ज़िंदगी के वर्क इशारे-तकदीर से ही पलटते
महज़ ख़्वाहिशों से ख़ुदाई - इबारत के अंदाज़ नहीं बदलते ।

दुनिया से उठा था मिर्ज़ा ग़ालिब भी आहें सर्द भरते
काग़ज़ी लकीरों से काश नक़्शे- नसीब भी बदलते ।


- बिमल सहगल
द्वारका , नयी दिल्ली। 


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2 years ago

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