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निर्मोही

                
                                                                                 
                            फूल-पत्तों पे थिरकती यह चंचल हवाएँ
                                                                                                

कतरा-कतरा यूं पिघलती श्यामल घटाएँ
शिकवा कोई दिल का उन्हें भी जा सुनाये
भुला दिये हैं जो, इस कद्र वो न याद आयें ।

बेबस तलाशती हर पल यह सूनी निगाहें
जहां खो आए कभी तुम्हें, वही वीरान राहें
बेरहम-निर्मोही, हुये क्यों तुम ऐसे पराए
उम्मीदें उड़ी, आ बैठे मायूसी के साये।

सुनो बेदर्दी, आवाज़ देती हैं यह सर्द आहें
लर्जता यह दिल, तरसती यह खुली बाहें
अब के लौटे तो निश्चित फिर जा न पाओगे
झूठे दे दिलासे या लाख बना बहाने चाहे।

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5 months ago

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