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पेच

                
                                                                                 
                            असमंजस
                                                                                                

के सोये
जाल को
सेंध लगा
संवेदनाओं के गुब्बार
ले उड़ते हैं
उसमें से आकांक्षाओं की
कुछ उनीदी लड़ियां
और छुपा आते हैं
उन्हें
हृदय के किसी
अनबूझे शरण्य में
जहां बैठी अदम्य कल्पना
बुन रही उन्हें चुन
संकल्पों के
करघे पे
एक हठीला
ताना - बाना ।

उन्मुक्त
तितलियों मानिंद
मचलती
थिरकती
कुलांचे भरती
हसरतों को
ढील दे उड़ा रही
चरखी पकड़ते
उकसाते
खुली छतों पर है
सबको बुला रही ।

उठो
उलझनें
सवांरों
अपनी अपनी डोरियां सम्भालों
आसमान की गहराई को आजमाओ
चलो ज़िन्दगी से फिर पेच लड़ाओ।


- बिमल सहगल
द्वारका , नयी दिल्ली। 


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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2 years ago

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