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वीरानगी

                
                                                                                 
                            कतरा-कतरा बह रही
                                                                                                

सांसों से बोझिल, परेशां ज़िन्दगी
मौजों से दरकिनार
रूठे लम्हों की बेबस रवानगी।

इस लुटे चमन से
क्या दे किसे कोई
ज़रदाये पत्तों से
आ लिपटी है वीरानगी ।

सो रहा बेदर्दी
तारों की चादर ओढ़ आसमां
कायनात ज्यों गुमशुदा
उजड़ा-सा है आशियां।

बे-मुरव्वत इन गलियों को छोड़
चल दिल तलाशें कोई दुनिया नयी
इस काफ़िले-जूनून में
चेहरा कोई पहचाना लगता नहीं

- बिमल सहगल
द्वारका , नयी दिल्ली। 


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2 years ago

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