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वक़्त

                
                                                                                 
                            आज का हाथ पकड़ कल खींच कर ले गया
                                                                                                

काल-चक्र से सना इक और कण धूल का
राह में कहीं छिटक गया;
भूत के अस्तित्व में वर्तमान जा सिमट गया।
कल भी आज बन इसी का हो जाएगा
इस के अथाह गर्भ में कहीं जा खो जाएगा।

इस निष्ठुर से मिलना हो तो
यादों की अंधेरी-संकरी
गलियों में भटकना होगा
भावनाओं की सांकल जा खटखटानी होगी।

कभी अंतरंग रहा शायद कोई अहसास
अनमने, धीरे से उठ
बंद कपाटों की झिर्री से झाँक,
आश्वस्त हो तुम्हें अंदर बुलाये
तुम्हारे बैठने को आसन भी खिसकाए
और चंद पल तुम्हारे अनुरोध पर
उन कसक भरे लम्हों को दोहराए।

पर यह ज़रूरी तो नहीं।
हो सकता है वह बाहर से ही लौटाए।
और भला क्यों नहीं?
अब तो तुम उसके कोई भी नहीं।
उसके पास तो पूरा इतिहास है-
बीत चुके अनंत काल का सब हिसाब।

वही है शाश्वत- अनश्वर
शेष सब मिथ्या; सब थोथा चिंतन।
कुछ पल जो बचे, घटित हो रहे
सभी तो इसके गिरवी पड़े;
ले जाएगा किसी क्षण
वक़्त का तक़ाज़ा करते।


-ई 602, पंचशील, प्लॉट 24, सैक्टर 4,
द्वारका, नई दिल्ली

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1 year ago

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