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जिंदगी तू मेरी क्या लगती है!

                
                                                                                 
                            कभी महफिल तो कभी खुद तनहाई,
                                                                                                

कभी दर्द तो कभी खुशी की शहनाई,
कभी जवानी कभी बिते दिनों की कहानी,
कभी सहेली तो अपने आप में एक पहेली,
कभी आरजू तो कभी कर दे मुझे अकेली,
कभी साथ तो कभी खुद ही बेबस बेचारी,
सच बता जिंदगी तु मेरी क्या लगती है !
साथ तो पुरा देती पर मन में आधा अधूरा हौसला,
कभी आझाद परिंदे सी तू कभी पसंद है घौसला,
कहीं कैद है तू भावनाओं में कहीं ठुकरा दे हर रिश्ता,
कहीं गुमसूम सी बैठी मुंह मोडके कभी औरों से वास्ता,
गम को लगाये कभी गले कभी बेबजह ही खुश हो ले,
तपती धूप में छांव कभी अंगार सी तपन बाकी तुझमें,
सच बता जिंदगी आखिर में तू मेरी क्या लगती है!
लौटके देखु मैं पिछे तो दर्द ही दर्द तुझमें समाया,
आज से आगे देखना चाहु तो जन्नत का तू साया,
कल थे जो अजनबी आज है वह जाने पहचाने,
आज के जाने पहचाने किसी मोड पे फिर अनजाने,
कदम कदम पर जाल बिखडा पहचान तेरी क्या हो,
शक्कर में घुलकर भी रहेगी हमेशा मीठी सी कटारी,
सच बता जिंदगी वाकई तू मेरी कुछ लगती भी है !
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3 months ago

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😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
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