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सावन के बारिश की जैसी बरस रही है आँखे

                
                                                                                 
                            सावन के बारिश की जैसी,बरस रही हैं आँखे
                                                                                                

मन की ब्यथा सुनाने को तरस रही है शांखे
उत्मुलन कैसे कर जाऊ,सौदा नहीं तराजू का
ओक (घर) मुकुट को स्वर्ण सजाऊ, शौर्य कला ये बाजू का
कहानी इस वास (घर) भूमि की सुना रही है,तांखे
सावन के बारिश की जैसी,बरस रही है आँखे
मानवता धूमिल हो जाती,कैसे कहू में बातें
शीने पर पत्थर रख कर के बीता रहा हूँ राते
वादा कर के जो सोया है,फर्ज़ निभाने आते
आपदा आने से पहले,अम्बर सा छा जाते
स्वांग प्रपंच जीवन के राहों में नहीं ओ राजे
सावन के बारिश की जैसी, बरस रही है आँखे

राइटर:-- नवनीत पाण्डेय सेवटा

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9 months ago

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