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आधी रात में, मेरा आना-जाना न समझ

                
                                                                                 
                            सफ़ेद हड्डी पे नहीं, ठोस पत्थरों पर ढला हूं,
                                                                                                

तू मुझे फक़त गोश्त का लोथड़ा न समझ।

मैं फौलाद हूं, टूटकर भी जुड़ता जाऊँगा,
मेरे दिल को, कांच का खिलौना न समझ।

मेरे भीतर बुलंद तज़ुर्बों का समंदर सोया है,
मुझे महफ़िलों का साज-ओ-सेहरा न समझ।

माना,मुझसे हुई होंगी खताऐं हजार मौला!
पर मिरी आशिकी को, तू खता न समझ।

मैं बदलते हालात में खुद को बदलता रहा,
मेरे महबूब ! तू मेरा वक्त गुजरा न समझ।

ये गज़ल-ए-इश्क़ सुनाने वालों का जश्न है,
मेरे दोस्त ! सियासत का जलवा न समझ।

मेरे ईमान का खुदा गवाह,और क्या चाहिए,
मेरे हक-ओ-हुकूक को तू बेमाना न समझ।

मुझे भी ख़ूब सताया है बागों में गुलाबों ने,
मोहब्बत में सताने वाले को, कांटा न समझ।

आया हूं तेरे शहर,तो वजीर बनके जाऊँगा,
तू मुझे शतरंज का, ढैया - प्यादा न समझ।

ये खता तिरी होगी कि तुझे नशा नहीं होता,
मेरे महबूब! मेरे जाम को आधा न समझ।

वो कौन था, जो तेरा घर खटखटा गया,
आधी रात में, मेरा आना-जाना न समझ।
- -श्रीधर
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1 month ago

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