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बेदर्द बुतों को प्यार ही किया

                
                                                                                 
                            उसने तब मुझे उम्दा आशिक करार दिया,
                                                                                                

आखिर जब मैंने, उसी के हाथों जहर पी लिया।

मैंने कब कहा, कि मैं मुलि्ज़म नहीं हूँ,
आखिर मैंने भी, बेदर्द बुतों को प्यार ही किया।

वो मिरी नज़र में, आदमी क्या रहा,
रोज वादा तोड़ा और रोज इकरार ही किया।

क्यों पोशीदा रखूँ, शिद्दत-ए-आरजू को,
वो जब भी अकेले पूछा, मैंने इजहार ही किया।

बुतपरस्ती की रिवायतें भी देखिए,
खुदा इस पार तो नहीं, मिला तो उस पार ही मिला।
-श्रीधर.
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1 month ago

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