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जिसने शरारती कनखियों से देखा हमें

                
                                                                                 
                            जड़ें अपनी बिना नापे, वो ख़ूब बढ़ गया था,
                                                                                                

भरी जवानी में शजर का सूखना लाज़िमी था।

मेरा उस्ताद हर कदम, मेरी उंगली पकडे़ चला,
उम्रभर मैं ये सोचता रहा, वो कैसा आदमी था।

कोई है जिसने शरारती कनखियों से देखा हमें,
वरना मैं दोशीजाओं पे फिदा आदमी, कहाँ था।

तुम जब भी चाहो, हमें सर-ए-आम मिला करो,
लोग पूछेंगे, रूहानी प्यार में छुपाना क्या था।

गेंदा गुलाब गुड़हल, रोपा हूं तुम्हारे आंगन में,
जब-जब फूल खिलें समझना माली अच्छा था।
-श्रीधर.
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2 months ago

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