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कई बार छुआ मैंने, ज़िंदगी को करीब से

                
                                                                                 
                            दूूर तक जिंदगी का पीछा तो किया मैंने,
                                                                                                

उसे हाथ से निकलना था, वो निकल गई।

उम्रभर, इकतरफा जुनून चलता रहा मिरा,
वो औरत नहीं, कि उसे भी मिरी ज़रूरत पड़ी।

कई बार छुआ है मैंने, ज़िंदगी को करीब से,
ज़िंदगी कमबख्त, उल्टा मुझपे बिफर गई।

ये शिद्दतें ये जुस्तजू, ये आरजू ये ख्वाहिशें,
फ़ाक़ा-मस्ती मिरी ही, मुझे बुतपरस्त कर गई।

न साथ दिया, न पीछा छोड़ा, न शब-ए-लम्स,
क़ब्र तक वो दांए-बांए, फिर जाने किधर गई।

-श्रीधर
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1 month ago

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