विज्ञापन

न मैं, न खुदा

                
                                                                                 
                            खुदा, मेरे वजूद का,
                                                                                                

मैं, खुदा के वजूद का,
इम्तहां लेता रहा,
सदियों से मुसलसल,
सिलससिला चलता रहा;
न मैं खुदा को,
समझ पाया,
न खुदा मुझे समझ पाया।

- श्रीधर.
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 months ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X