वक्त करे आखेट

                
                                                             
                            वक्त करे आखेट है भाई ,
                                                                     
                            
दुश्मन अपना पेट है भाई।

तेरे मन की लिखा करूँ
कोरी मेरी स्लेट है भाई ।

बनने से पहले बिखरे ये
घर मेरा या प्रेत है भाई ।

तूफां से बच पाये कैसे
मुट्ठी-मुट्ठी रेत है भाई ।

हाँ किसान हूँ सपने मेरे
कट्ठा-कुट्ठी खेत हैं भाई ।

मूल नहीं 'वो' सूद चढ़ाए
ऐसा धन्ना सेठ है भाई ।

० सुमन कुमार सिंह, आरा, बिहार। मो.नं. 8051513170
 
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।  आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 months ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
X