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साहिर ने लफ़्ज़ों में बयां किया मुहब्बत का दर्द 'जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला'

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सन् 1957 में फ़िल्म आयी थी प्यासा जिसमें गुरुदत्त एक हताश प्रेमी की भूमिका में थे, वह एक ऐसे कवि के किरदार में हैं जिसकी न किताब को ही सफ़लता मिल पा रही है और प्रेम तो उसको असफ़ल साबित कर ही चुका है।


उस पर भी क़िस्मत की मार ये है कि नौकरी मिली भी तो प्रेमिका के पति के दफ़्तर में और अकस्मात जब उसके घर पर सालों पुराने उसी प्यार से भेंट हो जाए तो आप भी कहेंगे कि…

जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला
हमने तो जब कलियाँ माँगी काँटों का हार मिला


शिद्दत से इश्क़ करना कुछ यूं है कि किसी तितली के पंखों में आपने 2 रंग और जोड़ दिए हों लेकिन जब उस प्रेम को मुकाम ना मिले तो रंगबिरंगी दुनिया भी फ़ीकी लगने लगती है और हर वो व्यक्ति थोड़ा विशेष लगता है जो महबूबा के साथ सफ़र कर रहा होता है। इन भावनाओं को शब्द देने का काम साहिर लुधियानवी से बेहतरीन कोई नहीं कर सकता। उन्होंने इस अधूरी दास्तान को यूं लिखा है जैसे इसको उन्होंने करीब से जीया हो।
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खुशियों की मंज़िल ढूँढी तो ग़म की गर्द मिली

4 years ago

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