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बातचीत: कलाकार का संगीत भाव की पालकी में बैठकर श्रोता के दिल तक पहुंचता है- पंडित कृष्णेंद वाड़ीकर

साहित्य
                
                                                                                 
                            प्रख्यात संगीतज्ञ पंडित कृष्णेंद वाड़ीकर जी की अमर उजाला से मुलाकत: “कलाकार का संगीत भाव की पालकी में बैठकर श्रोता के दिल तक पहुंचता है”
                                                                                                


प्र. 1- संगीत के प्रति रूचि किस उम्र में हुई ? परिवार में कोई परम्परा रही है? 

उत्तर: परिवार में 4 पीढियों से संगीत की परम्परा रही है। हमारा परिवार मूलतः हुबली कर्नाटक से है।  मुख्यतः महाराष्ट्र की शास्त्रीय संगीत पर आधारित कीर्तन पद्धति मेरे परदादा जी और दादाजी के माध्यम से घर में चली आ रही थी अतः बचपन से ही संगीत में रूचि रही है। उस समय के बड़े कलाकारों को भी सुनने और गुनने का अवसर मिला। आज भी हमारा परिवार श्री दत्त सम्प्रदाय के प्रमुख तीर्थ स्थल महाराष्ट्र के नृसिंह वाड़ी के पुजारी समाज का अंग है।
 
प्र. 2- शास्त्रीय संगीत की प्रारंभिक शिक्षा कहां से प्राप्त की ? आपकी गुरु परंपरा के बारे में और उसकी विशिष्टता के बारे में बताइए। 

उत्तर: अर्जुनसा नाकोड जी, जो किराना और ग्वालियर घराने के साधक थे, से गदग (कर्नाटक) प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। उसके बाद भारतरत्न पं. भीमसेन जोशी जी के शिष्य श्रीपति पड़ीगर से किराना घराने की गायकी, स्वर लगाव, आलापी और स्वर विस्तार जैसी विशेषताओं को सिखने का अवसर मिला। उत्तर प्रदेश के किराना गाँव से प्रारंभ हुए किराना घराने का उत्तर हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में अलग ही स्थान है। इसकी समृद्ध परंपरा में बन्दे अली खां, अब्दुल करीम खां साहब, सवाई गन्धर्व, पं. भीमसेन जोशी, गंगू बाई हंगल, रोशन आरा बेगम, फ़िरोज़ दस्तूर, सूरेह माने, प्रभा अत्रे, जैसे अनेक विद्वान गुणीजन हुए है।
 
प्र. 3- आपको संगीत जगत के अनेक सम्मान प्राप्त हुए है, किस सम्मान ने आपको विशिष्ट रूप से भावुक किया?
 
उत्तर: प्रत्येक लौकिक सम्मान गुरुजनों के और माता पिता के आशीष का स्मरण दिलाता रहता है। यूथ फेस्टिवल में स्वर्ण पदक, कर्नाटक संगीत नृत्य अकादमी का गुरु शिष्य परमपरा अवार्ड, आदी अनेक प्रस्कार मिले हैं पर मेरी नज़र में किसी कलाकार के लिए एक प्रस्तुति के बाद श्रोताओं के चहरे पर दिखाई देने वाला संतुष्टि और जुड़ाव का भाव सबसे बड़ा पुरस्कार होता है।  आगे पढ़ें

3 months ago

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