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मजरूह सुल्तानपुरी: दुनिया मुझे ढूंढ़े मगर मेरा निशाँ कोई न हो

majrooh sultanpuri ghazal aye dil mujhe aisi jagah le chal jahan koi na ho
                
                                                                                 
                            

ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहाँ कोई न हो


अपना पराया मेहरबाँ ना-मेहरबाँ कोई न हो

जा कर कहीं खो जाऊँ मैं नींद आए और सो जाऊँ मैं
दुनिया मुझे ढूँढ़े मगर मेरा निशाँ कोई न हो

उल्फ़त का बदला मिल गया वो ग़म लुटा वो दिल गया
चलना है सब से दूर दूर अब कारवाँ कोई न हो

4 months ago

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