मजरूह सुल्तानपुरी : शाम तन्हाई की है आएगी मंज़िल कैसे जो मुझे राह दिखा दे वही तारा न रहा

majrooh sultanpuri ghazal koi hum dum na raha koi sahaara na raha
                
                                                             
                            

कोई हम-दम न रहा कोई सहारा न रहा
हम किसी के न रहे कोई हमारा न रहा

शाम तन्हाई की है आएगी मंज़िल कैसे
जो मुझे राह दिखा दे वही तारा न रहा

ऐ नज़ारो न हँसो मिल न सकूँगा तुम से
तुम मिरे हो न सके मैं भी तुम्हारा न रहा

क्या बताऊँ मैं कहाँ यूँही चला जाता हूँ
जो मुझे फिर से बुला ले वो इशारा न रहा

2 months ago

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