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मीर तक़ी मीर: नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए, पंखुड़ी इक गुलाब की सी है

mir taqr mir ghazal hasti apni habaab ki si hai
                
                                                                                 
                            

हस्ती अपनी हबाब की सी है


ये नुमाइश सराब की सी है

नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है

चश्म-ए-दिल खोल इस भी आलम पर
याँ की औक़ात ख़्वाब की सी है

बार बार उस के दर पे जाता हूँ
हालत अब इज़्तिराब की सी है

नुक़्ता-ए-ख़ाल से तिरा अबरू
बैत इक इंतिख़ाब की सी है

मैं जो बोला कहा कि ये आवाज़
उसी ख़ाना-ख़राब की सी है

आतिश-ए-ग़म में दिल भुना शायद
देर से बू कबाब की सी है

देखिए अब्र की तरह अब के
मेरी चश्म-ए-पुर-आब की सी है

'मीर' उन नीम-बाज़ आँखों में
सारी मस्ती शराब की सी है

1 month ago

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😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
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