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Naseer Turabi: नसीर तुराबी की ग़ज़ल 'देख लेते हैं अब उस बाम को आते जाते'

Naseer turabi ghazal dekh lete hain ab us baam ko aate jaate
                
                                                                                 
                            
देख लेते हैं अब उस बाम को आते जाते

ये भी आज़ार चला जाएगा जाते जाते

दिल के सब नक़्श थे हाथों की लकीरों जैसे
नक़्श-ए-पा होते तो मुमकिन था मिटाते जाते

थी कभी राह जो हम-राह गुज़रने वाली
अब हज़र होता है उस राह से आते जाते

शहर-ए-बे-मेहर! कभी हम को भी मोहलत देता
इक दिया हम भी किसी रुख़ से जलाते जाते

पारा-ए-अब्र-ए-गुरेज़ाँ थे कि मौसम अपने
दूर भी रहते मगर पास भी आते जाते

हर घड़ी एक जुदा ग़म है जुदाई उस की
ग़म की मीआद भी वो ले गया जाते जाते

उस के कूचे में भी हो, राह से बे-राह 'नसीर'
इतने आए थे तो आवाज़ लगाते जाते
2 months ago

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